अज़ीम हाशिम प्रेमजी का जन्म 24 जुलाई 1945 को मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) में एक निज़ारी इस्माइली शिया मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके पूर्वज मूल रूप से गुजरात के कच्छ क्षेत्र से थे। उनके पिता, मोहम्मद हाशिम प्रेमजी, एक प्रसिद्ध व्यवसायी थे, जिन्हें बर्मा (अब म्यांमार) में “राइस किंग ऑफ बर्मा” के नाम से जाना जाता था। 1940 के दशक में, मोहम्मद हाशिम ने भारत में बसने का फैसला किया और महाराष्ट्र के जलगांव जिले के अमलनेर में वेस्टर्न इंडियन वेजिटेबल प्रोडक्ट्स लिमिटेड (WVPL) की स्थापना की, जो सनफ्लावर वनस्पति तेल और 787 नामक कपड़े धोने का साबुन बनाती थी।

1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान, पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने अज़ीम के पिता को पाकिस्तान आने और वहां वित्त मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया। हालांकि, मोहम्मद हाशिम ने इस प्रस्ताव को ठुकराकर भारत में रहने का फैसला किया, जो उनके देशभक्ति और भारत के प्रति निष्ठा को दर्शाता है।

अज़ीम प्रेमजी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई में पूरी की और इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया। लेकिन 1966 में, जब वे मात्र 21 वर्ष के थे, उनके पिता की अचानक मृत्यु हो गई। इस कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में छोड़कर भारत लौटना पड़ा और पारिवारिक व्यवसाय की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। बाद में, उन्होंने अपनी डिग्री पूरी की, जो उनकी दृढ़ता और सीखने के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

विप्रो का उदय और आईटी क्रांति में योगदान

अज़ीम प्रेमजी ने 1966 में वेस्टर्न इंडियन वेजिटेबल प्रोडक्ट्स लिमिटेड की कमान संभाली, जो उस समय हाइड्रोजनीकृत तेल और साबुन जैसे उपभोक्ता उत्पाद बनाती थी। कंपनी का नाम लंबा होने के कारण, अज़ीम ने इसे छोटा और आकर्षक बनाया। उन्होंने “वेस्टर्न” से W, “इंडिया” से I, और “प्रोडक्ट्स” से Pro लेकर कंपनी का नाम “विप्रो” (Wipro) रखा।

1970 के दशक में, अज़ीम प्रेमजी ने भारत में कंप्यूटर और प्रौद्योगिकी क्षेत्र की संभावनाओं को पहचाना। 1979 में, जब भारत सरकार ने आईबीएम को देश से बाहर किया, प्रेमजी ने इसे एक अवसर के रूप में देखा और विप्रो को कंप्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में ले गए। उन्होंने अमेरिकी कंपनी सेंटिनल कंप्यूटर कॉर्पोरेशन के साथ साझेदारी की और मिनी-कंप्यूटर निर्माण शुरू किया। धीरे-धीरे, विप्रो ने सॉफ्टवेयर विकास में कदम रखा और उच्च गुणवत्ता वाले इंजीनियरों को नियुक्त करके कंपनी को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया।

1980 के दशक में, प्रेमजी ने विप्रो को एक आईटी पावरहाउस में बदल दिया। उनकी दूरदर्शिता और लक्ष्य-केंद्रित नेतृत्व ने विप्रो को भारत की तीसरी सबसे बड़ी आईटी कंपनी बनाया, जिसका कारोबार आज 100 से अधिक देशों में फैला हुआ है और इसका मार्केट कैप 3 ट्रिलियन रुपये से अधिक है। आज, विप्रो को सॉफ्टवेयर उद्योग में वैश्विक नेताओं में से एक माना जाता है, और इसे “भारतीय आईटी उद्योग का सम्राट” कहा जाता है।

उपलब्धियां और सम्मान

अज़ीम प्रेमजी की उपलब्धियां केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। उन्हें उनके योगदान के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले हैं:

  • पद्म भूषण (2005) और पद्म विभूषण (2011): भारत सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा।
  • टाइम मैगज़ीन की सूची: 2004 और 2011 में, टाइम मैगज़ीन ने उन्हें दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल किया।
  • एशियावीक सम्मान: 2010 में, उन्हें दुनिया के 20 सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों में चुना गया।
  • फोर्ब्स की मान्यता: 1999 से 2005 तक, वे भारत के सबसे धनी व्यक्ति रहे और उन्हें “भारत का बिल गेट्स” कहा गया।
  • अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी: वे बेंगलुरु में अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के चांसलर हैं, जो शिक्षा और सामाजिक विकास के क्षेत्र में काम करती है।

परोपकारी कार्य और दानवीरता

अज़ीम प्रेमजी को केवल एक सफल व्यवसायी के रूप में ही नहीं, बल्कि एक महान परोपकारी के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा सामाजिक कार्यों के लिए दान किया है। 2013 में, उन्होंने “द गिविंग प्लेज” पर हस्ताक्षर करके अपनी संपत्ति का कम से कम आधा हिस्सा दान करने का वचन दिया।

उन्होंने अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन की स्थापना की, जो भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य, और आजीविका के क्षेत्र में काम करता है। फाउंडेशन ने $2.2 बिलियन के शुरुआती दान के साथ शुरूआत की और आज यह भारत के सात राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में सक्रिय है।

  • शिक्षा के लिए योगदान: फाउंडेशन का मुख्य उद्देश्य भारत में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता और समानता को बढ़ावा देना है। अज़ीम प्रेमजी स्कॉलरशिप प्रोग्राम वंचित समुदायों की लड़कियों को कॉलेज शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है, जिसके तहत हर साल 30,000 रुपये की सहायता दी जाती है।
  • दान की राशि: 2021-22 में, प्रेमजी ने 484 करोड़ रुपये दान किए, और कुल मिलाकर अब तक वे 15 अरब डॉलर से अधिक दान कर चुके हैं। कुछ स्रोतों के अनुसार, वे प्रतिदिन लगभग 27 करोड़ रुपये दान करते हैं।
  • विप्रो के शेयर: उन्होंने विप्रो में अपने 60% से अधिक शेयर फाउंडेशन के नाम कर दिए हैं, जो उनकी परोपकारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

अज़ीम प्रेमजी की सादगी और अनुशासन उनके व्यक्तित्व का एक अनोखा पहलू है, जो उन्हें अन्य अरबपतियों से अलग करता है:

  1. सादगी भरा जीवन: प्रेमजी अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं। वे लग्जरी होटलों के बजाय कंपनी के गेस्ट हाउस में ठहरना पसंद करते हैं। एक बार उन्होंने अपने सीईओ से ऑफिस के वॉशरूम में टॉयलेट पेपर के खर्च के बारे में पूछा, जो उनकी लागत के प्रति सजगता को दर्शाता है।
  2. सीढ़ियों की आदत: प्रेमजी अक्सर विप्रो के मुंबई कार्यालय में लिफ्ट के बजाय 14 मंजिलें पैदल चढ़ते थे। यह आदत उन्होंने स्टैनफोर्ड में पढ़ाई के दौरान बनाई थी।
  3. निजी जीवन: प्रेमजी अपनी निजी जिंदगी को बहुत गोपनीय रखते हैं। बीमार होने पर भी वे इसे किसी को नहीं बताते। वे अपने पालतू कुत्ते फॉक्सी के साथ यारकौड, तमिलनाडु में अपने रिसॉर्ट में समय बिताना पसंद करते हैं।
  4. पिता से सीखी ईमानदारी: प्रेमजी ने अपने पिता से ईमानदारी और नैतिकता की सीख ली और इसे अपने नेतृत्व में लागू किया। वे उदाहरण के साथ नेतृत्व करने में विश्वास रखते हैं।
  5. विश्व बैंक का सपना: युवावस्था में, प्रेमजी का सपना स्टैनफोर्ड से स्नातक होने के बाद विश्व बैंक में काम करना था, लेकिन पिता की मृत्यु ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

अज़ीम प्रेमजी की शादी यास्मिन से हुई है, और उनके दो बेटे हैं, ऋषद और तारिक। ऋषद वर्तमान में विप्रो के मुख्य रणनीति अधिकारी हैं और 2019 में अज़ीम के चेयरमैन पद से हटने के बाद कंपनी की कमान संभाल रहे हैं। प्रेमजी का निजी जीवन बेहद सादगी भरा है, और वे अपनी उपलब्धियों के बावजूद हमेशा विनम्र रहे हैं।

अज़ीम प्रेमजी ने प्रेमजी इन्वेस्ट नामक एक निजी प्राइवेट इक्विटी फंड भी स्थापित किया, जो $2 बिलियन के पोर्टफोलियो का प्रबंधन करता है। यह फंड उनकी निवेश रणनीतियों को दर्शाता है, जो न केवल लाभ पर केंद्रित है, बल्कि दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव पर भी ध्यान देता है।अज़ीम प्रेमजी का जीवन एक प्रेरणादायक कहानी है, जो दर्शाती है कि कठिन परिश्रम, दूरदर्शिता, और नैतिकता के साथ सफलता हासिल की जा सकती है। उन्होंने न केवल विप्रो को एक वैश्विक आईटी कंपनी बनाया, बल्कि अपनी परोपकारी गतिविधियों के माध्यम से लाखों लोगों के जीवन को बेहतर बनाया। उनकी सादगी, अनुशासन, और समाज के प्रति प्रतिबद्धता उन्हें एक सच्चा रोल मॉडल बनाती है।

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Journalist, News Writer, Sub-Editor

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