सांस्कृतिक विरासत का डिजिटलीकरण क्यों ज़रूरी?

भारत में ऐतिहासिक धरोहरों की भरमार है। प्रागैतिहासिक काल से लेकर औपनिवेशिक काल तक के स्मारक, स्थल और पुरावशेष देशभर में फैले हुए हैं। लेकिन इनका एकीकृत दस्तावेज़ीकरण नहीं होने के कारण, अनुसंधान और संरक्षण मुश्किल हो जाता है। इसी समस्या को हल करने के लिए 2007 में स्मारक और पुरावशेषों पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमएमए) की शुरुआत हुई। इसका मकसद एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करना है, जिससे ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित किया जा सके।

एनएमएमए की प्रमुख उपलब्धियाँ

  • 12.34 लाख पुरावशेष डिजिटाइज़ किए गए, जिनमें 4.46 लाख एएसआई संग्रहालयों और 7.88 लाख अन्य संस्थानों से जुड़े हैं।
  • 11,406 स्मारकों और स्थलों का दस्तावेज़ीकरण किया गया।
  • 2024-25 में मिशन के लिए 20 लाख रुपये आवंटित किए गए।

मिशन के मुख्य उद्देश्य

  • स्मारकों, पुरावशेषों और ऐतिहासिक स्थलों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करना।
  • केंद्रीय, राज्य और निजी संस्थानों में एक समान दस्तावेज़ीकरण सुनिश्चित करना।
  • संरक्षण और विरासत जागरूकता बढ़ाना।
  • प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना।
  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), राज्य एजेंसियों और अन्य संस्थानों के बीच समन्वय स्थापित करना।

ऐतिहासिक स्मारकों का संरक्षण

भारत में प्राचीन स्मारकों और पुरावशेषों की सुरक्षा के लिए 1958 का एएमएएसआर अधिनियम लागू है। इसके तहत 100 वर्ष से पुराने किसी भी स्मारक, शिलालेख या पुरातात्विक स्थल को ऐतिहासिक धरोहर घोषित किया जा सकता है। इसके अलावा, पुरावशेष एवं कला निधि अधिनियम, 1972 के तहत 100 साल से पुरानी मूर्तियों, पेंटिंग्स और ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं को भी संरक्षित किया जाता है।

डिजिटलीकरण के दिशा-निर्देश

एनएमएमए ने दस्तावेज़ीकरण को मानकीकृत करने के लिए दिशा-निर्देश तय किए हैं:

  • 300 DPI रिज़ॉल्यूशन में उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें खींची जाएं।
  • पुरावशेषों की तस्वीरें टिफ या रॉ फॉर्मेट में ली जाएं।
  • सभी डेटा MS Excel फॉर्मेट में सुरक्षित किया जाए।

डिजिटल तकनीक से विरासत संरक्षण

नए तकनीकी टूल्स जैसे 3D स्कैनिंग, वर्चुअल रियलिटी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को आसान बना दिया है।

  • डिजिटल आर्काइव्स से पांडुलिपियों और कलाकृतियों को संरक्षित किया जा सकता है।
  • वर्चुअल रीकंस्ट्रक्शन से क्षतिग्रस्त धरोहरों का पुनर्निर्माण संभव है।
  • इंटरैक्टिव टूल्स से पर्यटन और शिक्षा को बढ़ावा दिया जा सकता है।

भारत की सांस्कृतिक विरासत का डिजिटलीकरण भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। एनएमएमए, इस दिशा में बड़े पैमाने पर काम कर रहा है। तकनीकी सहयोग और जागरूकता के ज़रिए, हम अपनी ऐतिहासिक धरोहरों को सहेज सकते हैं और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।

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