ये चश्मे की दास्तां शुरू हुई 13वीं सदी से, जब इटली का एक साधु मठ में बैठा था, मिट्टी के दीये की रोशनी में पांडुलिपि पढ़ने की कोशिश कर रहा था। उसकी आँखें धुंधला रही थीं। तभी किसी ने उसे दो काँच के टुकड़े दिए, जो एक कील से जुड़े थे। अचानक, शब्द साफ दिखने लगे! यह पल था जब चश्मे की ऐतिहासिक यात्रा शुरू हुई। इसने दुनिया को देखने का तरीका बदल दिया। चलिए जानते हैं की कैसे चश्मा साधुओं के हाथों से लेकर हमारे आधुनिक जीवन तक पहुँचा।

मध्यकाल में चश्मे का जन्म कैसे हुआ?

मैंने कुछ तथ्य पढ़े और इंटरनेट पे रिसर्च की। वहाँ दी गई जानकारी के हियासब से 13वीं सदी में, इटली के मठों में साधु और विद्वान दिन-रात पांडुलिपियाँ लिखते थे। लेकिन उम्र बढ़ने से उनकी नजर कमजोर हो रही थी। करीब 1290 में, पीसा और फ्लोरेंस के चतुर कारीगरों ने पहला चश्मा बनाया। ये आज के स्टाइलिश चश्मे नहीं थे, बल्कि मोटे काँच के टुकड़े थे, जिन्हें नाक पर टिकाना पड़ता था। इन्हें ‘रिवेट चश्मा’ कहा जाता थे। 1306 में, एक साधु, जियोर्डानो दा पीसा, ने इस आविष्कार की तारीफ की। उन्होंने कहा, यह अभी बीस साल पुराना है। एक और साधु, एलेसांद्रो, ने इसे सबके साथ बाँटा। वेनिस, अपने शानदार मुरानो काँच के लिए मशहूर, चश्मा बनाने का केंद्र बना। 1301 तक, वहाँ के व्यापारी संगठन चश्मे की बिक्री को नियंत्रित करने लगे।

नाक से कान तक का सफर

शुरुआती चश्मे असुविधाजनक थे। इन्हें नाक पर संतुलन बनाकर रखना पड़ता था। लिखते समय इन्हें पकड़ना मुश्किल था! फिर, 1400 के आसपास, कारीगरों ने एक नया तरीका खोजा। उन्होंने चश्मे में टेम्पल जोड़े, जो कानों पर टिकते थे। 1352 में, एक चित्र में एक कार्डिनल को ऐसे चश्मे पहने दिखाया गया, जो कानों के पीछे लटकते थे। इससे चश्मा रोजमर्रा के काम में आसान हो गया। लोग अब बिना परेशानी के पढ़ और काम कर सकते थे। 1466 में, स्ट्रासबर्ग में दुनिया की पहली चश्मे की दुकान खुली। अब चश्मा सिर्फ साधुओं के लिए नहीं, बल्कि हर उस शख्स के लिए था, जिसे बेहतर नजर चाहिए थी।

दूर की नजर और नई संभावनाएँ

शुरुआत में, चश्मा सिर्फ पास की चीजें देखने में मदद करता था। इसे प्रेसबायोपिया कहते हैं। लेकिन दूर की नजर कमजोर वालों का क्या? तो भाई 1400 के मध्य में, अवतल लेंस आए, जो पास की नजर (मायोपिया) को ठीक करते थे। यह एक बड़ा बदलाव था। अब लोग दूर के पहाड़ या सड़क के साइन देख सकते थे। 1604 में, खगोलशास्त्री जोहानेस केपलर ने बताया कि ये लेंस कैसे काम करते हैं। उन्होंने समझाया कि काँच प्रकाश को मोड़ता है, ताकि आँख की रेटिना पर सही छवि बने। यह सिर्फ चश्मे के लिए नहीं, बल्कि आँखों की समझ के लिए भी क्रांति थी। अब चश्मा विद्वानों से लेकर नाविकों तक, सबकी मदद कर रहा था।

बेंजामिन फ्रैंकलिन का बाइफोकल चमत्कार

अब चलते हैं 1700 के दशक में। बेंजामिन फ्रैंकलिन, एक अमेरिकी वैज्ञानिक, की आँखें पास और दूर, दोनों की नजर में कमजोर थीं। बार-बार चश्मा बदलने से तंग आकर, उन्होंने 1780 के आसपास बाइफोकल लेंस बनाए। इसमें लेंस का ऊपरी हिस्सा दूर देखने के लिए और निचला हिस्सा पढ़ने के लिए था। अब एक ही चश्मे से सब कुछ साफ दिखता था! कुछ लोग कहते हैं कि शायद उनसे पहले किसी और ने यह बनाया, लेकिन फ्रैंकलिन ने इसे मशहूर किया। बाइफोकल ने लाखों लोगों की जिंदगी आसान की, खासकर उन बुजुर्गों की, जिनकी आँखें कमजोर हो रही थीं। यह दो समस्याओं का एक ही समाधान था।

19वीं सदी: स्टाइल और काम का मेल

1800 तक, चश्मा सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि स्टाइल का हिस्सा बन गया। लकड़ी और हड्डी के फ्रेम की जगह सोना और चाँदी आए। 1825 में, ब्रिटिश वैज्ञानिक जॉर्ज एयरी ने दृष्टिविकृति (एस्टिग्मेटिज्म) को ठीक करने वाले लेंस बनाए। इससे चश्मा और भी तरह की समस्याएँ सुलझाने लगा। फ्रेम के डिजाइन भी रचनात्मक हुए। पिंस-नेज चश्मे, जो नाक पर चुटकी की तरह टिकते थे, फैशन में आए, हालाँकि ये हमेशा आरामदायक नहीं थे। कुछ चश्मे रिबन से बाँधे जाते थे। फिर, एडवर्ड स्कारलेट जैसे ऑप्टिशियन ने कानों पर टिकने वाले टेम्पल को आम किया। अब चश्मा मजबूत और स्टाइलिश था, जो आज के चश्मों की नींव बना।

20वीं सदी: नई तकनीक, नए लेंस

1900 का दशक चश्मे के लिए क्रांति लेकर आया। जर्मन कंपनी जीस ने पंक्टल लेंस बनाए, जो प्रकाश को और सटीक फोकस करते थे। इससे चश्मा ज्यादा आरामदायक हुआ। फ्रेम में टाइटेनियम जैसे हल्के धातु आए। 1940 के दशक में, कुछ चश्मों में सुनने की मशीनें छिपाई गईं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद, प्लास्टिक फ्रेम बहुत लोकप्रिय हुए… सस्ते, रंगीन और टिकाऊ। बाइफोकल से ट्राइफोकल बने, जिसमें बीच की दूरी के लिए तीसरा हिस्सा था। फिर प्रोग्रेसिव लेंस आए, जिनमें बिना रेखा के फोकस बदलता था। ये बदलाव चश्मे को रोजमर्रा की जिंदगी में और आसान बना गए।

समायोज्य लेंस

2008 में, जोशुआ सिल्वर ने चश्मे को नया आयाम दिया। उन्होंने समायोज्य लेंस बनाए, जिनमें सिलिकॉन द्रव डालकर फोकस बदला जा सकता था। इसके लिए डॉक्टर की जरूरत नहीं थी! यह उन गाँवों के लिए वरदान था, जहाँ ऑप्टिशियन नहीं थे। सोचिए, कोई दूरदराज में रहने वाला व्यक्ति अपने चश्मे को खुद ठीक करके पढ़ सकता है। सिल्वर का यह आविष्कार दुनिया की उस समस्या को हल करने की कोशिश थी, जहाँ अरबों लोगों को चश्मा नहीं मिलता। यह दिखाता है कि चश्मे की ऐतिहासिक यात्रा आज भी नई मंजिलें तलाश रही है।

यह आज क्यों मायने रखता है

हर कहानी के पीछे इंसान की सूझबूझ और उसकी उसकी चतुराई है। साधुओं के रिवेट चश्मे से लेकर फ्रैंकलिन के बाइफोकल और सिल्वर के समायोज्य लेंस तक, हर कदम ने किसी की जिंदगी साफ की। आज चश्मा फैशन, सुरक्षा और नजर का जरिया है। चश्मे की ऐतिहासिक यात्रा हमें दिखाती है कि दो काँच के टुकड़े दुनिया बदल सकते हैं। अगली बार जब आप चश्मा पहनें, उन सैकड़ों सालों की मेहनत को याद करें।

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Creative Writer, Journalist, Sub-Editor

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