आजादी के 78 सालों के बाद भी हमारे देश भारत के एक कोने में ऐसी ज़िंदगी बसी है, जो आज के भारत की चमकती तस्वीर पर सवाल खड़े करती है। बिहार के खुदीराम बोस, बिरसा मुंडा, पीर अली खान जैसे महान क्रांतिकारिय जिस भारत को आजादी दिलाने में शहीद हो गए, उसी बिहार में आज भी एक ऐसा पिछड़ा हुआ भारत सांस ले रहा है, जो आज़ादी के मायने तक नहीं समझ पाया।

बिहार के दरभंगा जिले के पंडासराय इलाके में रहने वाला डोम समाज। नाम सुनते ही चेहरे पर जो दबी हुई संवेदनाएं आती हैं, वही इसकी पहचान हैं। 

भारतीय हिंदू जाति व्यवस्था में नीचे पायदान पर रखा गया यह समाज परंपरागत रूप से ढोल बजाने, संगीत और श्मशान से जुड़े कार्यों से जुड़ा रहा है। कुछ जगहों पर इन्हें चंडाल कहा जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि इन्हें शायद इंसान ही नहीं माना जाता।

जब पूरा भारत दिवाली की रोशनी में जगमगाता है, तब इसी देश में एक ऐसा गांव भी है जहां दिवाली का नाम तो लोग जानते हैं, पर ये नहीं जानते कि दिवाली होती कैसी है।

जब डिजिटल भारत में लोग मिठाइयों का स्वाद साझा करता है, तब इस गांव में चूल्हा जलाना भी किसी जंग से कम नहीं।

डोम समाज बिहार का सबसे गरीब, सबसे निचला तबका। जिस वक्त भारत के लाखों घरों में दीये जलते हैं, उस वक्त इनके घरों में बिजली का एक बल्ब होना भी बड़े चमत्कार से कम नहीं है। क्योंकि जहां बिजली ही नहीं, वहां रोशनी कहां से आएगी?

इस बस्ती के 20-30 घरों में बिजली अभी तक पहुंची ही नहीं। यहां के लोगों का कहना है कि जाति की वजह से आज भी वे भेदभाव झेल रहे हैं।

यह तो जाने दीजिए, यहाँ एक सरकारी शोचलय तक नहीं है। इस समाज की औरतों और बच्चों को आज भी रेल की पटरियों या जंगलों में शौच के लिए जाना पड़ता है। यह गांव भारत के विकास की उस सच्चाई को उजागर करता है, जिसे आंकड़ों और भाषणों में दबा दिया जाता है।

यही है दोहरा भारत—एक तरफ हम ‘विश्वगुरु’ बनने के सपने देख रहे हैं, दूसरी तरफ एक ऐसा भारत भी है जो मानव की सबसे बुनियादी जरूरतों से भी वंचित है। एक भारत जहां मॉल, हाईवे और क्लब हैं, वहीं दूसरा भारत है जहां इंसान जानवर जैसी जिंदगी जीने को मजबूर है।

ये बात सिर्फ डोम समाज की ही नहीं है, बिहार के पूर्णिया जिले में पाकिस्तानी टोला गांव भी इसी अंधेरे में है। यहाँ के लोगों की लड़ाई अपने गांव का नाम बदलवाने की है। वे बिरसा नगर कहलाना चाहते हैं—क्योंकि ‘पाकिस्तानी’ नाम उन्हें रोज जीते-जी अपमानित करता है। न वहां रोजगार है, न सरकारी योजनाओं की रोशनी। न जाने ऐसे कितने ही गांव हैं, जो डिजिटल भारत के नक्शे से बाहर रह गए हैं।

जब शहरी भारत सस्ता एलपीजी गैस या डिजिटल भुगतान की बात करता है, तब यहां चूल्हा तक नसीब नहीं है। जहां जगह जगह “सरकारी आवास योजना” के बैनर दिखाई देते हैं, यहां पर कोई पक्की दीवार तक नहीं है।

आस पास में ग्राम चिकित्सालय तक नहीं है, जो वहां रह रहे लोगों की बुनियनदी बीमारी का भी इलाज कर सके। अगर किसी को बड़ा रोग हो जाता है तो उसे दरभंगा भागना पड़ता है। और सबसे चौंकाने वाली बात ये है की वहां जाने के बाद भी उनका इलाज नहीं हो पता। अब सोचने वाली बात ये है की जिस आदमी के पास खाने के लिए अनाज न हो, वो आदमी बड़े शहरों के अस्पताल कैसे जाए?

यह है डिजिटल भारत की असलियत—आजादी के 78 सालों बाद। यह वो चेहरा है जिससे हम आंखें चुराते हैं। आधा भारत आज भी ऐसे ही जीने को मजबूर है।

क्या 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वाला भारत ऐसा दिखना चाहिए?

सच ये है की बिहार जितना कागज पर गरीब बताया जाता है, ज़मीन पर वह उससे कहीं ज्यादा टूटा हुआ है। इन लोगों के पास वोटर कार्ड है, वे सरकार चुनते हैं, फिर भी सरकारी योजनाएं इन तक क्यों नहीं पहुंचतीं? इस सवाल के पीछे छिपा है सबसे बड़ा सच—जाति।

2025 के डिजिटल भारत में भी जाति का भूत अभी जिंदा है। गांवों में आज भी दलित, ब्राह्मण, ठाकुर, क्षत्रिय की पहचान सब पर भारी है। कई लोग सिर्फ “निचली जाति” में जन्म लेने के कारण अब हमारे बीच नहीं हैं। इंसान का अहंकार बड़ा हो गया है और उसकी इंसानियत छोटी।

शहर हो या गांव, जाति हर जगह मौजूद है। इंसान की पहचान उसके कर्म से नहीं, उसकी जाति से हो रही है। इस रिपोर्ट की बात सिर्फ डोम समाज की नहीं, यह आवाज़ उन सभी भूले-बिसरे समाजों की है जो आज भी भारत के त्योहारों, डिजिटल योजनाओं और ‘नए इंडिया’ की परिधि से मीलों दूर हैं। जब तक हम इस सच को स्वीकार नहीं करेंगे और अपने अहंकार को नहीं तोड़ेंगे, तब तक भारत का सच्चा विकास सिर्फ भाषणों में रहेगा, जमीनी हकीकत में नहीं।

Disclaimer

इस लेख में प्रस्तुत जानकारी बिहार के दरभंगा जिले के पंडासराय इलाके के बारे में उपलब्ध स्रोतों और सामान्य ज्ञान पर आधारित है। लेख का उद्देश्य केवल जानकारी और जागरूकता प्रदान करना है, न कि किसी समुदाय, धर्म या व्यक्ति के प्रति पक्षपात करना या उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाना। लेख में व्यक्त विचार और तथ्य लेखक की समझ और उपलब्ध जानकारी पर आधारित हैं, जो समय के साथ बदल सकते हैं। पाठकों से अनुरोध है कि वे किसी भी संवेदनशील मुद्दे के लिए आधिकारिक स्रोतों से जानकारी सत्यापित करें। लेखक या प्रकाशक इस लेख के उपयोग से होने वाली किसी भी गलतफहमी या नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।

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Creative Writer, Journalist, Sub-Editor

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