रमज़ान की इबादत, चाँद रात की रौनक और ईद की उस पहली सुबह का अनकहा एहसास
कुछ त्योहार सिर्फ कैलेंडर पर नहीं, दिलों की गहराई में बसते हैं। वे आते हैं तो सिर्फ तारीख नहीं बदलती मौसम बदलता है, रिश्ते महकते हैं, और ज़िंदगी एक पल के लिए रुककर मुस्कुराती है। ईद ऐसा ही एक त्योहार है।
रात के आसमान में जब वह पतला-सा चाँद झाँकता है, तो लाखों दिलों में एक अजीब-सी हलचल मच जाती है। बच्चे छतों पर दौड़ते हैं, बुज़ुर्गों की आँखें नम हो जाती हैं, और माँएं रसोई में सेवइयों का इंतज़ाम करने लगती हैं। यह महज़ एक चाँद नहीं होता यह ईद का ऐलान होता है। यह एक ऐसे त्योहार की दस्तक होती है जो सिर्फ एक मज़हब का नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत का जश्न है।
ईद उल-फित्र यानी वह पवित्र दिन जब एक लंबी, कठिन और आत्मशुद्धि की यात्रा का समापन होता है और एक नई, उज्ज्वल शुरुआत का स्वागत किया जाता है।
रमज़ान: वह इबादत जो ईद को इतना खास बनाती है
ईद को समझना हो, तो पहले रमज़ान को समझना होगा। क्योंकि ईद की मिठास उसी इबादत की देन है।
उनतीस या तीस दिन चाँद की रफ्तार पर निर्भर लाखों मुसलमान भाई-बहन सुबह की पहली रोशनी से लेकर शाम की अज़ान तक न कुछ खाते हैं, न पीते हैं। लेकिन रोज़ा सिर्फ भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है।
रोज़ा है ज़ुबान पर काबू रखने का, आँखों को पाक रखने का, दिल को साफ रखने का। रोज़ा एक ऐसी कसौटी है जो इंसान को इंसान बनाती है उसे याद दिलाती है कि वह सिर्फ जिस्म नहीं, रूह भी है।
“الصوم جُنَّة” “रोज़ा एक ढाल है।” जब इंसान रोज़े से हो, तो उसे न बुरा बोलना चाहिए, न बुरा करना चाहिए। सहीह बुखारी, हदीस 1894
जब पेट भूखा हो, तब भी किसी के साथ बुरा न सोचो यही तो रमज़ान का असली सबक है। और जब तीस दिनों की यह साधना पूरी होती है, जब आखिरी रोज़ा रखा जाता है, जब आखिरी तरावीह पढ़ी जाती है तब आसमान में वह नन्हा चाँद उगता है और ऐलान करता है: “बधाई हो, तुमने कर दिखाया।”
यही है ईद का जन्म। यही है उसकी आत्मा।
चाँद रात: जब पूरी दुनिया जागती है
ईद से एक रात पहले की बात ही कुछ और होती है।
गलियाँ रोशन हो जाती हैं। बाज़ारों में भीड़ उमड़ पड़ती है। मेहंदी की दुकानों के बाहर लड़कियों की लंबी-लंबी कतारें लग जाती हैं। कोई नई चूड़ियाँ ले रहा है, कोई इत्र की तलाश में है, तो कोई अपनी नई शेरवानी को आखिरी बार आईने में देख रहा है।
घरों में माँएं और दादी-नानी रात भर जागकर सेवइयाँ बनाती हैं। उस सेवइयों की खुशबू सिर्फ रसोई में नहीं, बल्कि पूरे घर में, पूरे मोहल्ले में फैल जाती है।
“बेटे, मैंने सत्तर ईदें देखी हैं। लेकिन जब वह चाँद निकलता है, मेरा दिल आज भी वैसे ही धड़कता है जैसे पहली बार धड़का था। कुछ खुशियाँ बूढ़ी नहीं होतीं।” रहीम चाचा, मुंबई निवासी
चाँद रात की यह बेखुदी यह बेफ़िक्री, यह रौनक दुनिया के किसी भी त्योहार में शायद ही मिले। यह रात सिर्फ जागने की नहीं, महसूस करने की रात होती है।
ईद की सुबह: एक नई दुनिया का एहसास
और फिर आती है वह सुबह।
फज्र की अज़ान के साथ ही घर में हलचल शुरू हो जाती है। बच्चे सबसे पहले उठते हैं उनकी आँखों में नींद नहीं, बल्कि ईदी का इंतज़ार होता है। नए कपड़े पहनना, खुशबूदार इत्र लगाना, और फिर बड़ों से दुआएँ लेना यह सब मिलकर एक ऐसा लम्हा बनाते हैं जो ज़िंदगी भर याद रहता है।
मस्जिदें खचाखच भर जाती हैं। सड़कें नमाज़ियों से पट जाती हैं। कंधे से कंधा मिलाकर, अमीर-गरीब एक साथ सजदे में झुकते हैं।
ईद की नमाज़ में कोई अमीर नहीं, कोई गरीब नहीं। कोई ऊँचा नहीं, कोई नीचा नहीं। सब एक ही रब के बंदे सब एक जैसे।
नमाज़ के बाद जब लोग एक-दूसरे से गले मिलते हैं, “ईद मुबारक” कहते हैं तो उस एक पल में न कोई दुश्मनी होती है, न कोई शिकायत। बस होती है मोहब्बत।
सेवइयाँ: वह मिठास जो दिलों को जोड़ती है
ईद की बात हो और सेवइयों का ज़िक्र न हो यह तो मुमकिन ही नहीं।
सेवइयाँ सिर्फ एक मिठाई नहीं हैं यह एक रिश्ता है, एक परंपरा है, एक भावना है। जब माँ अपने हाथों से सेवइयाँ बनाती हैं और बच्चों को खिलाती हैं, तो उस कटोरी में सिर्फ दूध-चीनी नहीं होती उसमें होती है ममता, प्यार और वह अनकहा आशीर्वाद जो शब्दों में नहीं आता।
और जब पड़ोस के हिंदू, सिख या ईसाई परिवार को भी वही कटोरी भेजी जाती है तो ईद का असली मतलब सामने आता है।
ईद सिखाती है: खुशी बाँटने से बढ़ती है, घटती नहीं।
ज़कात और फितरा: इंसानियत का वह हिस्सा जो भुलाया नहीं जाता
ईद सिर्फ खुशी मनाने का दिन नहीं है यह ज़िम्मेदारी निभाने का दिन भी है।
इस्लाम में फितरा वह दान है जो ईद की नमाज़ से पहले हर सक्षम मुसलमान अदा करता है ताकि कोई भी ग़रीब ईद के दिन खाली हाथ न रहे। और ज़कात वह वार्षिक दान है जो साल भर की बचत पर निकाला जाता है और समाज के ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँचाया जाता है।
सोचिए एक ऐसा त्योहार जो यह सुनिश्चित करता है कि उसकी खुशी में समाज का हर तबका शामिल हो। अमीर आदमी पहले देता है, फिर जश्न मनाता है। क्या यह इंसानियत की सबसे खूबसूरत मिसाल नहीं?
बदलते वक्त में ईद का नया रंग
ज़माना बदला है, ईद मनाने के तरीके भी बदले हैं।
आज व्हाट्सएप पर मुबारकबाद आती है, वीडियो कॉल पर दादी से मिलते हैं, और इंस्टाग्राम पर ईद की तस्वीरें पोस्ट होती हैं। विदेश में बसे लोग अपने घर से हज़ारों मील दूर होते हुए भी उसी चाँद को देखकर एक जैसा महसूस करते हैं।
लेकिन एक बात नहीं बदली वह जज़्बा, वह एहसास, वह तड़प जो ईद की सुबह दिल में होती है।
चाहे मुंबई की घनी गलियाँ हों या दिल्ली की शाहजहानाबाद की रौनक, चाहे लखनऊ का नवाबी अंदाज़ हो या हैदराबाद की बिरयानी की खुशबू, चाहे ढाका हो या दुबई, लंदन हो या लाहौर ईद हर जगह एक जैसी है। बस प्यार का लिबास अलग-अलग है।
आखिरी बात: ईद सिर्फ एक दिन नहीं, एक सोच है
ईद मुबारक कहना आसान है।
लेकिन ईद का असली जश्न तब होता है जब हम अपने दिल से नफरत निकाल दें, जब हम अपने पड़ोसी की परवाह करें, जब हम किसी ज़रूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाएँ।
ईद हमें याद दिलाती है कि इस दुनिया में सबसे बड़ी इबादत है इंसानों से मोहब्बत करना।
तो आइए, इस ईद पर सिर्फ नए कपड़े नहीं पहनें एक नई सोच भी अपनाएँ। पुरानी रंजिशें भुला दें, टूटे हुए रिश्ते जोड़ें, और किसी एक ज़रूरतमंद की ज़िंदगी में खुशी का चाँद उगाएँ।
क्योंकि जब हम दूसरों को खुश करते हैं तभी हमारी ईद मुकम्मल होती है।
ईद मुबारक।
दिल से, उन सभी के लिए जो मानते हैं कि मोहब्बत ही सबसे बड़ा धर्म है।

