क्या होता है फील्ड मार्शल?
फील्ड मार्शल: युद्ध वीरों की दुर्लभ शिरस्त्राण
फील्ड मार्शल रैंक सैन्य इतिहास में चमकता है। यह युद्धकालीन नेतृत्व का सर्वोच्च सम्मान है। यह प्रतीकात्मक पद है, कोई सक्रिय कमान नहीं। प्राप्तकर्ता जीवनभर वर्दी पहनते हैं। यह दुर्लभ रैंक असाधारण वीरता को सलाम करता है। भारत और विश्व में इसके किस्से गूंजते हैं। फील्ड मार्शल सेना का सबसे ऊंचा रैंक है। इसे पाँच सितारों से पहचाना जाता है। यह युद्ध में असाधारण नेतृत्व के लिए दिया जाता है। यह आजीवन सम्मान है। कोई सेवानिवृत्ति नहीं होती। वर्दी पहनने का अधिकार अंत तक रहता है। कई देशों में यह रैंक है, पर यह विरले ही मिलता है।
भारत के दो फील्ड मार्शल: एक गौरवशाली विरासत
भारत ने अब तक केवल दो सैन्य अधिकारियों को फील्ड मार्शल की उपाधि दी है—कोडंडेरा करिअप्पा और सैम मानेकशॉ। इन दोनों की कहानियाँ देश के सैन्य इतिहास की नींव को दर्शाती हैं।
1. कोडंडेरा करिअप्पा: भारत के पहले फील्ड मार्शल
कोडंडेरा एम. करिअप्पा को 1986 में भारत का पहला फील्ड मार्शल बनाया गया। उन्होंने 1947 के भारत-पाक युद्ध में सेना का नेतृत्व किया और कश्मीर क्षेत्र को स्थिर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह रैंक उन्हें 87 वर्ष की उम्र में दिया गया। 1993 में उनकी मृत्यु तक वह अपनी वर्दी सम्मान के साथ पहनते रहे।
2. सैम मानेकशॉ: 1971 का रणनीतिक योद्धा
जनरल सैम मानेकशॉ को 1973 में फील्ड मार्शल की उपाधि मिली। उन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध का संचालन किया और बांग्लादेश की स्थापना में निर्णायक भूमिका निभाई। उनकी रणनीतिक क्षमता, सटीक योजना और करिश्माई नेतृत्व ने उन्हें अमर बना दिया। 2008 में निधन तक वे सैन्य वर्दी पहनते रहे।
भारत द्वारा इस रैंक को बहुत सीमित रूप से प्रदान किया जाना इसकी प्रतिष्ठा को और बढ़ाता है।
अन्य देशों में फील्ड मार्शल की स्थिति
ब्रिटेन:
यह रैंक ब्रिटेन में 1700 के दशक से चला आ रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्नार्ड मोंटगोमरी जैसे फील्ड मार्शल ने डीडे की सफलता में बड़ी भूमिका निभाई। हालांकि 21वीं सदी में इस रैंक को बहुत ही कम दिया गया है।
जर्मनी:
एरविन रोमल, जिन्हें “डेजर्ट फॉक्स” कहा जाता है, ने उत्तरी अफ्रीका में युद्ध के दौरान अद्भुत सैन्य कौशल दिखाया।
रूस:
जॉर्जी झूकोव, सोवियत यूनियन के मार्शल, ने हिटलर के खिलाफ निर्णायक मोर्चा संभाला और जीत दर्ज की।
अमेरिका:
अमेरिका में फील्ड मार्शल जैसी उपाधि नहीं होती। वहां “फाइव स्टार जनरल” का कॉन्सेप्ट है। जॉर्ज मार्शल जैसे अधिकारी युद्ध के बाद पुनर्निर्माण योजनाओं के लिए प्रसिद्ध हैं।
क्यों होता है यह रैंक इतना दुर्लभ?
फील्ड मार्शल की उपाधि सिर्फ विशेष परिस्थितियों में दी जाती है—जैसे युद्ध में असाधारण विजय या सशस्त्र बलों में क्रांतिकारी योगदान। यह केवल सम्मान की बात नहीं, बल्कि परंपरा, प्रेरणा और विरासत का प्रतीक होता है।
भारत में यह निर्णय सरकार द्वारा गहन विचार-विमर्श के बाद लिया जाता है। यह रैंक न तो राजनीतिक होता है और न ही पदोन्नति का हिस्सा।
आधुनिक समय में प्रासंगिकता
कई विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक टेक्नोलॉजी, ड्रोन, साइबर वॉरफेयर के दौर में यह रैंक अप्रासंगिक हो गया है। परंतु कई लोग इसे प्रेरणा का प्रतीक मानते हैं। 1999 के कारगिल युद्ध के बाद जनरल वी.पी. मलिक जैसे अधिकारियों को यह रैंक देने की चर्चा हुई, लेकिन अब तक कोई नई नियुक्ति नहीं हुई।
ब्रिटेन सहित कई देशों ने हाल के वर्षों में इस रैंक को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। इससे इसकी अनिश्चित भविष्यवाणी होती है।
साहस का प्रतीक
फील्ड मार्शल का रैंक केवल पद नहीं, बल्कि वीरता और नेतृत्व का सर्वोच्च प्रतीक है। भारत के करिअप्पा और मानेकशॉ ने इस उपाधि को जीवंत किया। दुनियाभर में मोंटगोमरी, रोमल और झूकोव जैसे नाम इसके गौरव को दर्शाते हैं।
यह रैंक भले ही आज कम उपयोग में हो, पर जब तक दुनिया में युद्ध होते रहेंगे, फील्ड मार्शल वीरता और सम्मान का पर्याय बने रहेंगे।

