‘इंक़लाब ज़िंदाबाद!’
ये नारा आज भी रूह को झकझोर देता है।
कभी रैलियों में गूंजता है, कभी दीवारों पर लिखा मिलता है, और कभी फिल्मों में सुनाई देता है… पीढ़ी दर पीढ़ी जैसे कोई मशाल चलती आ रही हो।
अकसर लोग इसे शहीद भगत सिंह की आवाज़ से जोड़ते हैं… उस नौजवान क्रांतिकारी से जिसने इस नारे को अंग्रेज़ों की संसद तक पहुँचाया।
लेकिन क्या आप जानते हैं… ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ नारे की सबसे पहली आवाज़ कौन थी? भारत को यह नारा किसने दिया?
वो कोई बंदूक उठाने वाले क्रांतिकारी नहीं थे… बल्कि एक कलम उठाने वाले शायर थे।
एक ऐसे इंसान जो एक ही समय में विद्रोही भी थे और आध्यात्मिक भी, बेख़ौफ़ भी और नरमदिल भी… और वो थे हसरत मोहानी… एक क्रांतिकारी और बाग़ी शायर।
सबसे पहले ललकारने वाला शायर
1875 में उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे ‘मोहान’ में जन्मे सय्यद फ़ज़लुल हसन, आगे चलकर कई रूपों में सामने आए… एक शायर, मार्क्सवादी, सूफ़ी, और आज़ादी के दीवाने। उन्होंने अपने नाम में ‘हसरत’ (जिसका मतलब होता है तड़प) और ‘मोहानी’ (अपने गांव से) जोड़ा, और इस तरह इतिहास के पन्नों पर अपनी जगह बना ली।
1921 में, जब कांग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता की बात कहने से हिचक रही थी, उस वक़्त हसरत मोहानी ने बिना डरे सबसे पहले कहा… ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद!’
यह सिर्फ एक नारा नहीं था… यह एक सपना था, एक नया भारत गढ़ने का मज़बूत इरादा।
हसरत के लिए इंक़लाब का मतलब सिर्फ़ अंग्रेज़ों को बाहर निकालना नहीं था। उनका इंक़लाब हर उस ज़ुल्म और हर उस इंसान के खिलाफ था… जो जात-पात, अमीरी-गरीबी, धर्म के नाम पर बंटवारा चाहते थे।
वो एक ऐसे मुल्क का ख्वाब देखते थे… जहाँ हर इंसान बराबर हो, निडर हो, और आज़ाद हो।
शहीद भगत सिंह ने मशाल को आगे बढ़ाया, लेकिन उसे जलाया था हसरत ने
8 साल बाद, जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय असेम्बली में बम फेंकते हुए ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ का नारा लगाया, तो ये नारा हर उस क्रांतिकारी, हर उस इंसान के लिए मशाल बन गया, जो भारत की संपूर्ण स्वतंत्रता चाहते थे।
लेकिन इस नारे की आत्मा? वो हसरत मोहानी की थी।
भगत सिंह ने इस नारे को आवाज़ दी, लेकिन उसकी आग हसरत ने लगाई
हसरत की बग़ावत बचपन से ही शुरू हो गई थी।
वो स्कूल में टॉपर थे, मैथ्स में स्कॉलरशिप जीती। अलीगढ़ के मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज (आज का अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी) में पढ़ते हुए उन्हें तीन बार निकाला गया… क्योंकि वो अंग्रेज़ों की नीतियों के खिलाफ़ खुलकर बोलते थे।
फिर भी उन्होंने, 1903 में बी.ए. की डिग्री पूरी की, ये साबित करते हुए कि प्रतिभा और बग़ावत साथ-साथ चल सकते हैं।
वो न सिर्फ़ तेज़ छात्र थे, बल्कि शायरी में भी माहिर। तस्लीम लखनवी और नसीम देहलवी जैसे उस्तादों से सीखा और एक आला दर्जे के शायर बन गए। लेकिन उनकी ग़ज़लें सिर्फ़ इश्क़ की नहीं थीं… वो हथियार थीं।
वो शब्द जो पूरे मुल्क को हिला देते थे
हसरत मोहानी की शायरी में एक साथ नरमी और तूफ़ान था।
उनकी सबसे मशहूर ग़ज़ल ‘चुपके चुपके रात दिन’ जो आज भी ग़ुलाम अली और जगजीत सिंह की आवाज़ों में जिंदा है… उन्होंने जेल में लिखी थी।
लेकिन उनका इश्क़ सिर्फ़ माशूक से नहीं था… वो मुल्क से भी था।
1903 में ‘उर्दू-ए-मुअल्ला’ नाम से उन्होंने एक मैगज़ीन शुरू की… जिसमें उन्होंने अंग्रेज़ हुकूमत की धज्जियाँ उड़ा दीं। उन्होंने सिर्फ़ भारत ही नहीं, बल्कि मिस्र में हो रहे अत्याचारों पर भी लिखा।
नतीजन उन्हें इसके लिए जेल हो गई।
जेल में ही उन्होंने अपनी डायरी ‘मुशाहिदात-ए-जिंदान’ लिखी, जिसमें कैद की ज़िंदगी, सोच और बग़ावत सब दर्ज हैं।
उनकी शायरीयां सिर्फ़ खूबसूरत नहीं थीं… वो हसरत मोहानी की तरह क्रांतिकारी और बहादुर थीं।
वो पहले शख़्स जिन्होंने ‘पूर्ण स्वराज’ की मांग की
1921 में, जब कांग्रेस अभी ‘डोमिनियन स्टेटस’ की बातें कर रही थी, हसरत मोहानी ने सीधे कह दिया…
“हमें आज़ादी-ए-कामिल चाहिए…” यानि पूरी आज़ादी।
8 साल बाद, 1929 में कांग्रेस ने पहली बार ‘पूर्ण स्वराज’ की मांग की। लेकिन हसरत तब तक बहुत आगे बढ़ चुके थे।
वो किसी आधे-अधूरे समझौते से खुश नहीं थे। वो हर कीमत पर आज़ादी चाहते थे। और कहने से नहीं डरते थे।
जो क्रांतिकारी मस्जिदों में सोता था
हसरत मोहानी 1919 में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के प्रेसिडेंट बने, लेकिन उन्होंने अपना रास्ता खुद चुना।
जब बंटवारे की बात आई, तो उन्होंने उसे ठुकरा दिया। उनका मानना था… भारत सबका है।
हसरत, बंटवारे के बाद 1947 में पाकिस्तान नहीं गए। यहीं भारत में रहे, ताकि वो उन मुस्लिमों की आवाज़ बन सकें, जो अपना वतन नहीं छोड़ना चाहते थे।
वो संविधान सभा के सदस्य थे… लेकिन कभी सरकार की कोई सुविधा नहीं ली।
न बंगला।
न गाड़ी।
वो हमेशा थर्ड क्लास में सफ़र करते। एक बार किसी ने पूछा तो बोले… “क्योंकि इससे नीचे कोई चौथी क्लास नहीं है।”
उनकी सादगी दिखावा नहीं थी… वो उनका जीने का तरीका था।
सूफ़ी… और कम्युनिस्ट
हाँ, ये सच है। हसरत मोहानी जैसे लोग बहुत कम होते हैं।
1925 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना में उनका हाथ था। उन्होंने रूस की क्रांति से प्रेरणा ली, और भारत के लिए एक संघीय मॉडल का सपना देखा… कुछ-कुछ सोवियत यूनियन जैसा।
लेकिन उसी के साथ-साथ, वो गहरे धार्मिक भी थे। मुसलमान थे, कई बार हज पर भी गए। और साथ ही मथुरा में जन्माष्टमी भी मनाते थे, कृष्ण पर शायरी करते थे।
उन्हें अल्लाह और कृष्ण… दोनों से मुहब्बत थी।
वो मानते थे कि भारत एक ऐसा देश हो सकता है… जहाँ धर्म सिर्फ़ बर्दाश्त नहीं किया जाए… बल्कि मन से अपनाया जाए।
हसरत मोहानी द्वारा भगवान कृष्ण पर लिखि गई पंक्ति
मथुरा कि नगर है आशिक़ी का
दम भरती है आरज़ू इसी का
हर ज़र्रा-ए-सर-ज़मीन-ए-गोकुल
दारा है जमाल-ए-दिलबरी का
बरसाना-ओ-नंद-गाँव में भी
देख आए हैं जल्वा हम किसी का
पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ था
हर नग़्मा-ए-कृष्ण बाँसुरी का
वो नूर-ए-सियाह या कि हसरत
सर-चश्मा फ़रोग़-ए-आगही का
एक दूरदर्शी… जिसे सबने हमेशा नहीं समझा
हसरत मोहानी अकसर अपने ज़माने से आगे थे। शायद बहुत आगे।
उन्होंने एक ऐसा भारत सोचा था जो 6 स्वायत्त ज़ोन में बंटा हो… एक तरह का परिसंघ।
ये आइडिया उस समय के भारत के लिए बहुत बड़ा था।
उन्होंने संविधान पर हस्ताक्षर करने से भी इनकार कर दिया… क्योंकि उन्हें लगा ये संविधान ग़रीबों के लिए काफी नहीं है।
हसरत राजनीति में खुश करने नहीं, बल्कि हिला देने के लिए थे।
एक विरासत… जो आज भी ज़िंदा है
13 मई 1951, लखनऊ में हसरत मोहानी इस दुनिया से रुख़सत हुए। आज उनके नाम पर कॉलेज हैं, सड़कों के नाम हैं, और छात्रावास हैं।
जब कोई इंक़लाब ज़िंदाबाद का नारा लगाता है तो उनकी विरासत आज भी हवा में गूंजने लगती है।
- उन्होंने भगत सिंह को एक नारा दिया।
- भारत को एक सपना दिया।
- उर्दू शायरी को एक ज़मीर दिया।
तो अगली बार जब आप किसी रैली में, किसी फिल्म में, या किसी सड़क पर ये नारा सुनें, तो याद रखिएगा… जिसने इस नारे को सबसे पहले कहा था… उसने इसे ग़ुस्से में नहीं, उम्मीद में कहा था।
हसरत मोहानी सिर्फ़ इंक़लाब के नारे नहीं लगाते थे… वो उसे जीते थे।
Also Read: भारत के भूले हुए क्रांतिकारी | कनकलता बरुआ: असम की युवा शहीद

