रात के ठीक ग्यारह बजे, जब फाल्गुन पूर्णिमा का चाँद आसमान के बीचोंबीच आ जाता है, तब भारत के किसी न किसी कोने में एक बुजुर्ग औरत अपनी बहू को समझा रही होती है
“पहले परिक्रमा करो, फिर जल चढ़ाओ, फिर अपनी बुराई सोचो और उसे इस आग में छोड़ दो।”
यह निर्देश किसी धर्मग्रंथ से नहीं आया। यह उस औरत की माँ ने उसे दिया था। उसकी माँ को उसकी नानी ने। यह परंपरा की वो मौखिक संसद है जो हज़ारों साल से बिना किसी संविधान संशोधन के चली आ रही है।
होलिका दहन सिर्फ एक अनुष्ठान नहीं है। यह भारत की सबसे पुरानी, सबसे जीवित, और सबसे ग़लत समझी गई सामूहिक थेरेपी है।
वो कहानी जो हम भूल गए
हम होलिका दहन की कहानी जानते हैं या यही सोचते हैं।
हिरण्यकश्यप। प्रह्लाद। होलिका। आग। चमत्कार।
लेकिन इस कथा को जब एक सांस्कृतिक नृतत्वशास्त्री की आँख से देखा जाए, तो इसमें जो परतें निकलती हैं, वो चौंकाती हैं।
हिरण्यकश्यप सिर्फ एक राजा नहीं था। वो उस राजसत्ता का प्रतीक है जो यह तय करती है कि उसकी प्रजा किसकी पूजा करे। जो ईश्वर को भी राजाज्ञा का मोहताज बनाना चाहती है। भारत के इतिहास में ऐसे हिरण्यकश्यप बार-बार आए हैं अलग-अलग वेशभूषा में, अलग-अलग विचारधारा के साथ।
प्रह्लाद उस आस्था का प्रतीक है जो सत्ता से नहीं डरती। जो यातना सहती है लेकिन झुकती नहीं। दुनिया के हर लोकतंत्र को ऐसे प्रह्लादों की ज़रूरत है।
और होलिका?
यहीं कथा सबसे दिलचस्प मोड़ लेती है।
होलिका को वरदान मिला था अग्नि से अभय। लेकिन वह वरदान एक शर्त पर था: कि वो इसका उपयोग किसी निर्दोष को नुकसान पहुँचाने के लिए न करे। जब उसने प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश किया, तो शर्त टूट गई। वरदान निष्फल हो गया।
यह भारतीय दर्शन की सबसे सूक्ष्म नैतिक घोषणा है
कोई भी शक्ति, कोई भी वरदान, कोई भी विशेषाधिकार तब काम नहीं करता जब उसका उद्देश्य अधर्म हो।
आज की भाषा में कहें तो: immunity का दुरुपयोग, immunity को ही नष्ट कर देता है।
वो आग जो हर युग में अलग बोलती है
होलिका दहन की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यह एक स्थिर अनुष्ठान नहीं है। यह हर युग में एक नया अर्थ ग्रहण करती है।
स्वतंत्रता संग्राम के दौर में होलिका की आग औपनिवेशिक दासता को जलाने का प्रतीक बनी। गाँधी के नेतृत्व में होलिका दहन के साथ विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई। वो आग सिर्फ लकड़ी नहीं जला रही थी वो एक राजनीतिक संकल्प जला रही थी।
विभाजन के बाद जब भारत सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था, तब होलिका दहन वो त्योहार था जहाँ हिंदू और मुस्लिम दोनों पड़ोसी एक साथ खड़े होते थे क्योंकि अगले दिन एक-दूसरे पर रंग फेंकना था। उस एक रात में पूरे साल की साझेदारी सिमटी होती थी।
आज जब भारत के शहर धुंध में डूब रहे हैं, जब हर होलिका दहन के बाद AQI खतरनाक स्तर पर पहुँच जाता है यह आग एक नया, असुविधाजनक सवाल पूछती है।
वो सवाल जो आग पूछती है
दिल्ली, लखनऊ, पटना इन शहरों में होलिका दहन की रात PM2.5 का स्तर कई बार 300 से 400 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक पहुँच जाता है। WHO की सुरक्षित सीमा है 15।
यह एक असुविधाजनक तथ्य है। लेकिन इसे कहना ज़रूरी है।
प्रश्न यह नहीं है कि होलिका दहन हो या न हो। प्रश्न यह है कि हम किस होलिका दहन की बात कर रहे हैं।
गाँव की वो होलिका जिसमें एक छोटी-सी अग्नि के इर्द-गिर्द पूरा समुदाय इकट्ठा होता है, कथा सुनता है, नई फसल की पहली बालियाँ अर्पित करता है वो पर्यावरण की दृष्टि से भी एक संतुलित अनुष्ठान है।
शहर की वो होलिका जिसमें महीनों से जमा किया गया पुराना फर्नीचर, प्लास्टिक, रबर जलाया जाता है वो न परंपरा है, न आस्था। वो अज्ञानता और सुविधावाद का मिश्रण है।
परंपरा की रक्षा का अर्थ है उसके मूल को पकड़ना उसके विकृत स्वरूप को नहीं।
होलिका दहन में अग्नि का प्रतीकात्मक महत्व है। प्रतीक के लिए एक छोटी, शुद्ध अग्नि पर्याप्त है। उसके लिए पूरे मोहल्ले का वायुमंडल ज़हरीला करने की ज़रूरत नहीं।
जो हम जलाना भूल गए
होलिका दहन की परंपरा में एक और आयाम है जो आधुनिक शहरी जीवन में लगभग ग़ायब हो गया है।
पुराने समय में लोग होलिका दहन से पहले मानसिक रूप से एक सूची बनाते थे
किस बुराई को आज जलाना है? किस रिश्ते की कड़वाहट को? किस पुराने अपमान को? किस आदत को?
यह एक सामूहिक catharsis था। एक सभ्यतागत mental health practice जो हज़ारों साल पहले, बिना किसी therapist के, बिना किसी app के, एक सामुदायिक अनुष्ठान के रूप में रची गई थी।
आज हम होलिका के चारों ओर खड़े होकर selfie लेते हैं। Instagram story डालते हैं। और घर लौट जाते हैं उन्हीं बुराइयों, उन्हीं कड़वाहटों, उन्हीं टूटे रिश्तों के साथ।
आग तो जली। लेकिन वो नहीं जला जो जलना चाहिए था।
होलिका दहन और भारत की स्त्री
एक पहलू जिस पर बहुत कम लिखा गया है।
होलिका दहन का नेतृत्व पारंपरिक रूप से स्त्रियाँ करती हैं। वे परिक्रमा करती हैं। वे पूजा करती हैं। वे कथा सुनाती हैं। वे ही तय करती हैं कि अग्नि कब प्रज्वलित होगी।
यह उल्लेखनीय है क्योंकि भारत के अधिकांश पुरुष-प्रधान अनुष्ठानों में स्त्री की भूमिका प्रायः दोयम दर्जे की रही है। लेकिन होलिका दहन वो त्योहार है जहाँ स्त्री केंद्र में है।
शायद इसलिए भी क्योंकि यह कथा एक स्त्री की नैतिक विफलता की कथा है। और भारतीय परंपरा ने स्त्री को वो गरिमा दी कि वो इस विफलता को स्वयं judge करे, स्वयं उस अग्नि की साक्षी बने, और स्वयं यह संकल्प ले कि होलिका जैसी भूल उसके घर में, उसके जीवन में नहीं होगी।
यह स्त्री को दंडित करने की परंपरा नहीं यह स्त्री को न्यायकर्ता बनाने की परंपरा है।
अंत में वो एक क्षण
हर साल, फाल्गुन पूर्णिमा की रात, भारत एक अजीब काम करता है।
वो एक आग जलाता है। और उस आग के चारों ओर खड़े होकर चाहे महानगर हो या छोटा-सा गाँव, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, अमीर हो या ग़रीब लोग एक पल के लिए वही करते हैं जो हज़ारों साल से होता आया है।
वो रुकते हैं।
वो आग देखते हैं।
वो कुछ सोचते हैं।
इस रुकने में, इस सोचने में, इस सामूहिक ठहराव में होलिका दहन का असली अर्थ है।
बाकी सब मिथक, पूजा-विधि, परिक्रमा, मंत्र वो सब उस एक क्षण तक पहुँचाने की व्यवस्था है। जब इंसान आग के सामने खड़ा होता है और अपने आप से पूछता है
“मुझमें क्या है जिसे जलना चाहिए?”
जिस दिन हम यह सवाल पूछना बंद कर दें
उस दिन होलिका दहन महज़ एक धुआँ होगा।
Subscribe Deshwale on YouTube

