कल २८ मार्च २०२६ है। भारत के लिए यह एक बड़ा दिन है। बेंगलुरु के एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम की दूधिया रोशनी दुनिया को यह बताने के लिए तैयार है कि इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) का १९वां सीजन शुरू हो चुका है। लेकिन इसी चमक के पीछे एक डरावना सच भी छिपा है। आज ईरान युद्ध का २९वां दिन है। एक तरफ मैदान पर चौकों-छक्कों की बरसात होगी और दूसरी तरफ खाड़ी देशों में बारूद की गंध हवा में घुली होगी। यह अजीब विरोधाभास है कि जिस वक्त होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में समुद्री सुरंगें बिछी हुई हैं, उस वक्त भारत का मध्यवर्ग अपने पसंदीदा खिलाड़ी का स्ट्राइक रेट चेक करने में व्यस्त है।

इसे एक तरह का ‘गैस-लाइटिंग’ ही कहा जाएगा। जब दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर खड़ी है, तब हमारे टीवी स्क्रीन पर केवल विज्ञापन और क्रिकेट का शोर है। यह ब्रांड की जीत है या हमारी संवेदनाओं की हार, यह कहना मुश्किल है।


महंगाई का छक्का और मिडिल क्लास की मजबूरी

अमेरिका के ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को तहस-नहस कर दिया है। कच्चे तेल की कीमतें १३० डॉलर प्रति बैरल के पार जा रही हैं। दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में रसोई गैस का सिलेंडर १,२०० रुपये के ऊपर निकल चुका है। हालात इतने खराब हैं कि सरकार को आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू करना पड़ा है। राशनिंग की बातें हो रही हैं, लेकिन क्रिकेट के तमाशे पर कोई लगाम नहीं है।

अजीब बात यह है कि देश का बड़ा हिस्सा इंडक्शन कुकटॉप पर वापस लौट रहा है क्योंकि गैस मिल नहीं रही है। लेकिन चिन्नास्वामी स्टेडियम में एक ओवर के दौरान जितनी बिजली खर्च होती है, उससे विदर्भ के एक छोटे गांव को हफ्ते भर रोशन किया जा सकता है। यह विकास का कैसा मॉडल है जहां मनोरंजन को बुनियादी जरूरतों से ऊपर रखा गया है? क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जिसे सिर्फ ‘तमाशा’ चाहिए, चाहे पेट खाली ही क्यों न हो?


BCCI की अपनी कूटनीति और युद्ध का शोर

IPL अब सिर्फ एक खेल नहीं रह गया है। यह अपने आप में एक संप्रभु सत्ता बन चुका है। इसकी अपनी अर्थव्यवस्था है और अपनी ही विदेश नीति। आपको २०२५ का ‘ऑपरेशन सिंदूर’ याद होगा? भारत-पाकिस्तान सीमा पर तनाव अभी कम भी नहीं हुआ था कि क्रिकेट के आकाओं ने लीग की घोषणा कर दी थी। संदेश साफ था: सीमा पर गोलियां चलें या न चलें, स्ट्रैटेजिक टाइम-आउट नहीं रुकना चाहिए।

दुनिया भर के क्रिकेटर निजी जेट से भारत आते हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाहर पेट्रोल की कीमतें क्या हैं। पिछले साल दिसंबर में हुई नीलामी में एक तेज गेंदबाज को २४.५ करोड़ रुपये में खरीदा गया। आज की महंगाई दर के हिसाब से इस रकम में एक पूरे कस्बे का एक महीने का चूल्हा जल सकता था। लेकिन स्टेडियम के वीआईपी बॉक्स में आज भी विदेशी पनीर और कीमती वाइन परोसी जाएगी। यह असमानता इतनी गहरी है कि इसे देखकर सिहरन होती है।


डिजिटल इंडिया और फंतासी क्रिकेट का नशा

आजकल एक और चीज बड़ी मशहूर हुई है। वह है फंतासी क्रिकेट ऐप। बिहार का एक गरीब किसान अपनी मेहनत की आखिरी ५० रुपये की कमाई इस उम्मीद में लगा देता है कि शायद उसकी किस्मत चमक जाए। वही किसान अपनी फसल मंडी तक नहीं ले जा पा रहा है क्योंकि डीजल की कमी है और भाड़ा तीन गुना बढ़ गया है।

IPL समाज के लिए एक ‘सिडेटिव’ यानी शामक दवा की तरह काम कर रहा है। यह हमारे डर और चिंताओं को कुछ घंटों के लिए दबा देता है। जब तक टीवी पर मिस्ट्री स्पिनर की गुगली दिख रही है, तब तक लोग भूल जाते हैं कि उनकी बेटी की स्कूल वैन की फीस दोगुनी हो गई है। विज्ञापनदाता जानते हैं कि घबराई हुई जनता को सामान बेचना सबसे आसान होता है। इसीलिए युद्ध के माहौल में भी बीमे और ठंडे पेय पदार्थों के विज्ञापनों की बाढ़ आई हुई है।


बेंगलुरु का संकट और क्रिकेट का नखलिस्तान

बेंगलुरु शहर भी आजकल बड़ा अजीब व्यवहार कर रहा है। यहाँ के स्टार्टअप वाले अभी भी ‘डिस्ट्रप्टिव एआई’ की बातें करते नहीं थकते। जबकि हकीकत यह है कि शहर पानी की भारी किल्लत और बिजली कटौती से जूझ रहा है। लेकिन चिन्नास्वामी स्टेडियम एक अलग ही दुनिया है। वहां की घास को सींचने के लिए उस पानी का इस्तेमाल होता है जिसे व्हाइटफील्ड के लोग तरस रहे हैं।

कल का मैच रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु और सनराइजर्स हैदराबाद के बीच है। इसे ‘दिग्गजों की जंग’ कहा जा रहा है। असल में यह ‘ध्यान भटकाने वालों की जंग’ है। एक तरफ मीडिया जगत के बड़े नाम हैं और दूसरी तरफ करोड़ों फैंस की भावनाएं। हम एक ऐसे देश बन गए हैं जो खेल से तभी प्यार करता है जब उसमें ग्लैमर और नाच-गाने का तड़का लगा हो। खेल की भावना शायद कहीं पीछे छूट गई है।


रसोई की जंग और सात गेंदों का ओवर

आम भारतीय घरों की स्थिति आज किसी युद्ध क्षेत्र से कम नहीं है। माताएं अपने बच्चों से कह रही हैं कि तली-भुनी चीजें कम खाओ क्योंकि तेल महंगा है। गैस सिलेंडर बचाने के लिए खाने के मेनू में बदलाव किए जा रहे हैं। लोगों को डर है कि अगर ईरान युद्ध मई तक चला, तो शायद राशन कार्ड पर ही गैस मिलेगी।

पर जैसे ही पहली गेंद फेंकी जाएगी, यही लोग सब कुछ भूलकर टीवी के सामने बैठ जाएंगे। यह एक तरह का ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ है। हमने अपने अपहरणकर्ता (मनोरंजन उद्योग) से ही प्यार करना शुरू कर दिया है। बीसीसीआई ने हमें यकीन दिला दिया है कि चाहे दुनिया जल रही हो, ‘शो मस्ट गो ऑन’। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस खाड़ी क्षेत्र से हमारा तेल आता है, वहां आग लगी है और हम यहाँ ‘फायरपावर’ की बातें पिच पर कर रहे हैं।


तर्कहीनता की हद और तकनीक का सहारा

अब थोड़ा तकनीकी पक्ष पर भी बात कर लेते हैं। ‘इम्पैक्ट प्लेयर’ नियम अब अपने चौथे साल में है। इसने खेल को पूरी तरह से आंकड़ों का खेल बना दिया है। जब वैश्विक सप्लाई चेन धीमी पड़ रही है, तब क्रिकेट को और तेज करने की कोशिश की जा रही है। एक पत्रकार के तौर पर कवर ड्राइव के बारे में लिखना बड़ा अजीब लगता है जब दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की आहट से सहमी हुई है।

लेकिन शायद यही हमारी नियति है। हम एक संकट से बचने के लिए दूसरे काल्पनिक सुख का सहारा लेते हैं। अखबार पढ़ते समय गैस की कीमतों वाली खबर से नजर हटाकर स्कोरकार्ड पर ले जाना अब हमारी आदत बन चुकी है। यह बदलाव इतना सहज हो गया है कि अब हमें इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता।


ईरान युद्ध का असर और सरकारी रुख

सरकार का रुख भी मिला-जुला है। एक तरफ हम रूस से सस्ता तेल खरीदने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ आत्मनिर्भर बनने का नारा दिया जा रहा है। लेकिन IPL के शेड्यूल में एक मिनट की भी कटौती नहीं की गई। किसी भी स्टेडियम की लाइट कम नहीं की गई। क्या मनोरंजन वाकई हमारी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर होना चाहिए?

जिन टैंकरों पर हमले हो रहे हैं, वे हमारे देश की अर्थव्यवस्था की धमनियां हैं। लेकिन जब तक सैटेलाइट सिग्नल ठीक है और विज्ञापन बिक रहे हैं, तब तक युद्ध सिर्फ एक ‘बैकग्राउंड शोर’ है। खेल विशेषज्ञ मध्यक्रम की मजबूती पर चर्चा करेंगे, लेकिन तेल शोधक कारखानों पर गिरती मिसाइलों पर सब खामोश रहेंगे।


आखिरी ओवर का सच

IPL अपनी खुद की एक वास्तविकता बनाता है। इस दुनिया में युद्ध सिर्फ एक ‘सप्लाई चेन की समस्या’ है जिसे कुछ प्रतिबंधों और कागजी कार्रवाई से ठीक किया जा सकता है। लेकिन सड़क पर चलने वाले आदमी के लिए यह सच अलग है। उसे पता है कि उसकी जेब से कटने वाला हर अतिरिक्त रुपया उस युद्ध की देन है जिस पर उसका कोई बस नहीं है।

जैसे-जैसे टूर्नामेंट फाइनल की तरफ बढ़ेगा, स्टेडियम और आम जनता के बीच की खाई और चौड़ी होती जाएगी। एक तरफ लिनेन के कुर्ते पहने रईस लोग होंगे और दूसरी तरफ वो लोग जो रात का खाना बनाने के लिए गैस बचा रहे होंगे। यह असमानता का सबसे बड़ा तमाशा है। २०२६ का यह सीजन शायद इतिहास में सबसे ज्यादा देखा जाने वाला सीजन बनेगा। इसलिए नहीं कि हम क्रिकेट को ज्यादा प्यार करते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि हमें हकीकत से मुंह छिपाने के लिए एक बड़ी ओट चाहिए।

क्षितिज पर जो नारंगी चमक दिख रही है, वह किसी स्टेडियम की लाइट नहीं है। वह एक जलते हुए क्षेत्र की परछाई है जो उस चमचमाती ट्रॉफी पर पड़ रही है जिसे जीतने का हमने फैसला किया है।

क्या हम वाकई जीत रहे हैं या यह सिर्फ एक और भ्रम है? इसका जवाब शायद हमें तब मिलेगा जब ये लाइटें बंद होंगी और हमें अंधेरे में अपनी रसोई की खाली बोतलों का सामना करना पड़ेगा। तब तक के लिए, आप अपनी टीम का उत्साह बढ़ाते रहिए, क्योंकि तमाशा तो चलता रहना चाहिए।

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