ज़रा कल्पना कीजिए… एक ज्वालामुखी फूटता है, आसमान में राख और गैसें उगलता है। देखने में तो रोमांचक लगता है, लेकिन असल बात इससे काफी गहरी है। दरअसल, ‘ज्वालामुखी से ठंडक या गर्मी’ वाला असर हमें दिखाता है कि ये विस्फोट धरती को कुछ समय के लिए ठंडा कर सकते हैं, लेकिन लंबी अवधि में तापमान बढ़ा भी सकते हैं। यानी ये प्रकृति की ओर से एक जलवायु खींचतान है… जैसे दो विपरीत शक्तियां रस्साकशी कर रही हों।

आपको लगेगा कि ज्वालामुखी तो सिर्फ ज़मीन के आकार को बदलते हैं, लेकिन असल में ये हमारे मौसम और पर्यावरण को भी उलझा देते हैं। 

शायद ही आपको पता हो की 1991 में फिलीपींस का माउंट पिनातुबो फटा था। माउंट पिनातुबो के ज्वालामुखी विस्फोट ने न केवल फिलीपींस में, बल्कि दुनिया भर में जलवायु पर प्रभाव डाला। इस विस्फोट से निकली राख और सल्फर डाइऑक्साइड ने वायुमंडल में एक परत बना दी, जिसने सूर्य के प्रकाश की कुछ मात्रा को पृथ्वी तक पहुंचने से रोक दिया। और इसके परिणामस्वरूप कुछ समय के लिए वैश्विक तापमान में गिरावट आ गई। जैसे प्रकृति ने कुछ समय के लिए ठंडा करने वाला स्विच ऑन कर दिया हो। इस असर से उत्तरी गोलार्ध में तापमान कम हुआ और कुछ समय के लिए ग्लोबल वॉर्मिंग पर विराम सा लग गया।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस घटना के बाद पूरे विश्व का औसत तापमान लगभग आधे डिग्री सेल्सियस तक गिर गया।

पर ये राहत कुछ ही सालों की थी। छोटे-छोटे कण जिन्हें एयरोसोल कहा जाता है। यह धीरे-धीरे धरती पर गिरने लगे और ठंडक का असर खत्म हो गया। और इसके बाद आया कहानी में एक बड़ा मोड़।

एक तरफ जहां ज्वालामुखी ठंडक देते हैं, वहीं दूसरी ओर ये कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें भी छोड़ते हैं। ये गैसें सूरज की गर्मी को धरती पर रोककर रखती हैं… जैसे आपने शरीर पर एक गर्म कंबल डाल लिया हो।

अब इसमें सबसे बड़ी समस्या ये है कि जहां एयरोसोल जल्दी गायब हो जाते हैं, वहीं ये गैसें दशकों या सदियों तक हवा में बनी रहती हैं। और अगर बार-बार ज्वालामुखी फटते रहे तो ये गैसें जमा हो जाएंगी और वातावरण को और गर्म कर देंगी।

यानी ज्वालामुखी हमें थोड़ी देर के लिए ठंडक तो दे देंगी, लेकिन बाद में वही हमें धीमी और लंबी गर्मी में झोंक देंगी।

मतलब थोड़ी देर का मज़ा, उसके बाद लंबी सजा!

अब ज़रा इस चमचमाते, सफेद ग्लेशियर की बात करते हैं। कुछ ज्वालामुखी ऐसे इलाकों में हैं जहां बर्फ की मोटी चादरें सालों से जमी हैं… जैसे आइसलैंड, कनाडा या फिर अंटार्कटिका। इतनी भारी बर्फ ज़मीन पर इतना दबाव डालती है कि नीचे छुपा मैग्मा बाहर ही नहीं आ पाता। वो वहीं कहीं अंदर, इंतज़ार करता है।

लेकिन जलवायु परिवर्तन की वजह से ये ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। जैसे ही बर्फ हटेगी, धरती से दबाव हटेगा और नीचे इंतज़ार कर रहा मैग्मा ऊपर उठने लगेगा।

अंटार्कटिका में ऐसे सैकड़ों ज्वालामुखी हैं जो फिलहाल सोए हुए हैं, लेकिन वैज्ञानिक के अनुसार जैसे-जैसे बर्फ हटेगी, ये ज्वालामुखी जाग जाएंगे। इसमें सदी लग सकती है, लेकिन शुरुआत हो चुकी है।

अब ज़रा सोचिए… जैसे ही बर्फ पिघलनी शुरू हुई, नीचे दबा ज्वालामुखी जाग उठा और फट पड़ा। उसके फटने से ज़हरीली गैसें बाहर निकलीं, जिससे धरती और गर्म हो गई। और जब गर्मी बढ़ी, तो और बर्फ पिघलने लगी। बस, यहीं से शुरू हो गया इस चक्र का खतरनाक सिलसिला।

इसे ही कहते हैं फीडबैक लूप… ऐसा चक्र जो खुद को और तेज़ कर रहा है। और यही चक्र जलवायु परिवर्तन को और भी भयानक बना सकता है।

ऐसा नहीं है कि हम पहली बार ऐसा देख रहे हैं। पिछली बर्फीली उम्र में भी जब बर्फ पिघली थी, तो ज्वालामुखियों की सक्रियता बढ़ गई थी। अब वही कहानी दोबारा शुरू हो रही है… बस इस बार इंसानी गतिविधियों ने इस प्रक्रिया को तेज कर दिया है।

अंटार्कटिका: सोता हुआ राक्षस

अंटार्कटिका को अक्सर हम बर्फीला, शांत और दूर का इलाका मानते हैं। लेकिन हकीकत ये है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा ज्वालामुखीय इलाका है… वो भी बर्फ के नीचे छुपा हुआ।

जैसे-जैसे बर्फ पिघल रही है, वैसे-वैसे इस ‘प्रेशर कुकर’ का ढक्कन हट रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले दशकों में यहां से विस्फोटों की संख्या और तीव्रता दोनों बढ़ सकती हैं। और इनका असर सिर्फ अंटार्कटिका तक सीमित नहीं रहेगा… ये पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करेगा।

इस चक्र को तोड़ने का एक ही रास्ता है… ग्लेशियरों को पिघलने से रोकना। और इसका मतलब है… ग्रीनहाउस गैसों को कम करना। यानी कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों का उत्सर्जन घटाना।

हमें आइसलैंड, अंटार्कटिका जैसे इलाकों में ज्वालामुखियों की निगरानी भी बढ़ानी होगी। ताकि विस्फोट से पहले चेतावनी दी जा सके।

यह प्रक्रिया धीरे होती है, इसका असर सदियों में दिखता है… लेकिन अगर हम आज तैयारी करें तो नुकसान कम किया जा सकता है।

अभी तो ज्वालामुखी कुछ समय के लिए ठंडक दे रहे हैं, लेकिन ये हमें लंबी गर्मी की ओर धकेल भी रहे हैं।

आप सोच सकते हैं, कह सकते हैं की ‘अंटार्कटिका के ज्वालामुखी और हमसे इसका क्या लेना-देना?’ लेकिन यही बात सबसे ज़्यादा जरूरी है। क्योंकि अगर ये चक्र नहीं टूटा, तो हमारे शहरों में गर्मियां और भयानक हो जाएंगी, तूफान और भयंकर हो जाएंगे, समुद्र का जलस्तर भी बढ़ जाएगा।

यह सिर्फ वैज्ञानिकों की चर्चा नहीं है… ये हमारी ज़िंदगी, हमारे बच्चों का भविष्य और हमारे पूरे ग्रह की बात है।

ज्वालामुखी से ठंडक या गर्मी जैसी कहानियां हमें ये समझने में मदद करती हैं कि सबकुछ आपस में जुड़ा हुआ है। और अगर हम चुप रहे तो एक दिन ज्वालामुखी खुद बोलेंगे… और तब हमारी आवाज़ शायद सुनी भी न जाए।तस्वीर बड़ी है, डरावनी भी है… लेकिन इसे समझकर ही समाधान निकाला जा सकता है।
ये समय है जागने का, सोचने का और बदलाव की ओर कदम बढ़ाने का… ताकि ये सोए हुए ज्वालामुखी फिर से न जागें।

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Creative Writer, Journalist, Sub-Editor

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