अगर मैं कहूँ की केरल में एक ऐसा गाँव है, जहां अधिकतर बच्चे जुड़वां हैं, तो शायद आप लोगों को यकीन न आए। लेकिन मैं आपसे कोई मज़ाक नहीं कर रहा, न ही कोई काल्पनिक कहानी सुना रहा हूं। केरल के मल्लापुरम ज़िले के एक छोटे से गांव कोडिन्ही में अगर आपकी नज़र किसी बच्चे पर पड़ेगी तो आपको लगेगा की इसे तो मैंने अभी पीछे देखा था… ये एकदम से आगे कैसे आ गया। कहीं ये कोई छलावा तो नहीं।
नहीं… वो छलावा बिल्कुल भी नहीं है।
ऐसा इसलिए है कि यहां सच में हर तरफ़ जुड़वां बच्चे ही दिखाई देते हैं। यही है कोडिन्ही गांव के जुड़वां बच्चों का रहस्य… एक ऐसा रहस्य जिसे विज्ञान अभी तक सुलझा नहीं पाया है।
कोडिन्ही की आबादी करीब 2,000 परिवारों की है, लेकिन यहां 400 से ज़्यादा जुड़वां जोड़े हैं। ये आंकड़ा दुनिया के औसत से छह गुना ज़्यादा है।
तो क्या है इस जुड़वां गांव की कहानी?
कुछ तो अलग है ये गांव
कोडिन्ही, जो तिरुरंगडी शहर के पास स्थित है, नन्नांब्रा पंचायत के अंतर्गत आता है। सालों तक गांव वाले इसे सामान्य बात मानते रहे। लेकिन 2008 में एक स्कूल हेल्थ कैंप के दौरान पहली बार यह सवाल उठा… एक ही क्लास में इतने बच्चे एक जैसे कैसे दिख सकते हैं?
उसके बाद एक स्थानीय डॉक्टर ने अपने रिकॉर्ड टटोले और चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। उसके बाद जर्मनी, जापान और भारत के वैज्ञानिक यहां पहुंचे और रिसर्च शुरू हुआ।
हर कोई बस एक ही सवाल पूछ रहा था… यहां इतने जुड़वां बच्चे क्यों होते हैं?
विज्ञान भी हैरान है
शुरुआती रिसर्च में वैज्ञानिकों ने कई संभावनाएं तलाशी… क्या कोई खास जीन गांव में ज्यादा फैल गया है? क्या पानी, मिट्टी या खानपान में कुछ खास है?
कुछ ने माना कि यहां पीढ़ियों से एक खास रिसेसिव जीन चलता आ रहा है, जिससे जुड़वां बच्चों की संभावना बढ़ती जा रही है। पर चौंकाने वाली बात ये है कि अब तक कोई भी सिद्धांत साबित नहीं हो पाया है।
पानी, मिट्टी और भोजन सब जांचे गए हैं। कोई ठोस कारण सामने नहीं आया।
इतना ही नहीं, कोडिन्ही में जुड़वां बच्चे बिना किसी मेडिकल तकनीक या इलाज के होते हैं। ज्यादातर महिलाएं अपनी बीस की उम्र में ही जुड़वां बच्चों को जन्म देती हैं।
गांववालों का मानना है कि यह भगवान की देन है
जहां वैज्ञानिक रिसर्च में उलझे हैं, वहीं गांव के लोग इसे आशीर्वाद मानते हैं। कुछ इसे पूर्वजों की कृपा मानते हैं, तो कुछ इसे ज़मीन से जुड़ी कोई आत्मिक शक्ति बताते हैं। यहां जुड़वां बच्चे अनोखे नहीं, बल्कि भाग्यशाली माने जाते हैं।
अब बात यहीं आकर नहीं रुकी…
कोडिन्ही का ये रहस्य इतना गहरा और लगातार चलने वाला था कि गांववालों ने इसे सिर्फ संयोग मानकर छोड़ नहीं दिया। बल्कि उन्होंने इसे पहचान बना लिया।
यहीं पर बना भारत का पहला जुड़वां बच्चों का संगठन… ट्विन्स एंड किन एसोसिएशन। इस संगठन का मकसद सिर्फ आंकड़े इकट्ठा करना नहीं था। ये एक तरह का सपोर्ट सिस्टम बना… उन परिवारों के लिए जिनके घर जुड़वां बच्चे जन्म लेते हैं। यह संगठन गांव में जुड़वां बच्चों और उनके परिवारों को पंजीकृत करने और सहायता प्रदान करने के लिए स्थापित किया गया था। यह संगठन स्थानीय रूप से ‘ट्विन्स टाउन’ के नाम से भी जाना जाता है।
गांव ने मिलकर एक ऐसी मज़बूत कम्युनिटी बनाई, जहां जुड़वां होना सामान्य नहीं, गर्व की बात है।
यह संगठन त्योहारों में शामिल होता है, मेडिकल चेकअप्स कराता है, और देश-दुनिया को कोडिन्ही की इस अनोखी खूबी से जोड़ता है।
पता है इस कहानी को क्या चीज़ ख़ास बनाती है? गांव में विज्ञान और आस्था का एक साथ चलना।
क्या यह गांव वैज्ञानिक खोज का हिस्सा बन सकता है?
जहां गांववाले इसे चमत्कार मानते हैं, वहीं दुनियाभर के वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर कोडिन्ही के रहस्य का हल मिल गया, तो इससे मानव प्रजनन और जेनेटिक्स के नए दरवाज़े खुल सकते हैं। शायद इससे यह पता चल सके कि कुछ इलाकों में जुड़वां बच्चे अधिक क्यों होते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि कोडिन्ही अकेला ऐसा गांव नहीं है। ब्राज़ील का कैंडिडो गोडोई और नाइजीरिया का इग्बो ओरा भी जुड़वां जन्म दर में उच्च स्थान पर हैं।
क्या इन सब गांवों में कोई जेनेटिक कड़ी है? या फिर कोई ऐसा पर्यावरणीय कारण, जिसे हम अभी तक समझ नहीं पाए हैं?
यही वजह है कि कोडिन्ही पर अभी भी रिसर्च चल रही है। कालीकट विश्वविद्यालय का जेनेटिक्स विभाग बीते दशक से यहां के परिवारों की मेडिकल हिस्ट्री, खून के सैंपल और स्थानीय डेटा जमा कर रहा है। लेकिन इसका उन्हें कोई फ़ायदा हासिल नहीं हुआ।
इतनी खोज और रिसर्च के बाद एक बात तो साफ़ हो जाती है… विज्ञान हर सवाल का जवाब नहीं दे सकता… कम से कम अभी तो नहीं। हो सकता है कि ये सच में कोई चमत्कार हो, या फिर ये भी मुमकिन है कि ये कोई जेनेटिक गड़बड़ हो… क्योंकि ब्राज़ील का कैंडिडो गोडोई और नाइजीरिया का इग्बो-ओरा भी इसी कड़ी में शामिल हैं। अब इन्हें देखते हुए मन में शक तो उठता है। लेकिन भाई, जेनेटिक भी तो आखिर कुदरत की ही देन हैं… देखते हैं कि वैज्ञानिकों की खोज इस रहस्य में क्या नया ढूंढ निकालती है।
आज के तेज़ रफ्तार विज्ञान युग में ऐसे रहस्य कम ही बचे हैं जो वैज्ञानिक जांच की हर परत को पार कर जाते हैं। यह कहानी हमें बताती है कि जवाब सिर्फ लैब में नहीं मिलते। कभी-कभी वो गांवों की मिट्टी में छिपे होते हैं।
कोडिन्ही गांव का रहस्य सिर्फ एक वैज्ञानिक सवाल नहीं है। यह एक मानवीय कहानी भी है… जहां आस्था और विज्ञान साथ-साथ चलते हैं। जहां सवाल अब भी बाकी हैं, लेकिन ज़िंदगी फिर भी खूबसूरत ढंग से चल रही है।
अगर आप कभी केरल जाएं, तो कोडिन्ही का चक्कर ज़रूर लगाएं। आपको एक रहस्यमयी भारत की झलक देखने को मिलेगी। कहीं न कहीं भारत में आज भी ऐसे राज़ दफ़न हैं, जिनको खोदना शायद असंभव है।
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