किसी भी मनुष्य के लिए मानसिक स्वास्थ्य उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि शारीरिक स्वास्थ्य। लेकिन फिर भी भारत में पुरुषों के मानसिक कल्याण को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। समाज पुरुषों से उम्मीद करता है कि वे मजबूत, दृढ़ और भावनाहीन हों। इस कारण उन्हें अपनी कमजोरी व्यक्त करने का अवसर नहीं मिल पाता है। इससे होता यह है कि कई पुरुष चुपचाप तनाव, चिंता और अवसाद का दंश झेलते रहते हैं, लेकिन किसी से सहायता लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
पुरुष अपने मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करने से हिचकिचाते क्यों हैं?
तो भारत में बचपन से ही लड़कों को अपनी भावनाओं को दबाने के लिए सिखाया जाता है। “मर्द को दर्द नहीं होता” या “लड़के रोते नहीं हैं” कुछ आम मुहावरे हैं। यह इस धारणा को मजबूत करती है कि भावनाओं को दिखाना कमजोरी का संकेत है। फिर जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, उनके ऊपर यह दबाव बढ़ता चला जाता है। परिवार का पालन-पोषण करने की जिम्मेदारी हो, करियर में सफलता पाने का दबाव हो या समाज की अन्य अपेक्षाओं को पूरा करने का सवाल हो, यह हर किसी के लिए मानसिक तनाव का कारण बनता है। लेकिन पुरुष अपनी इन भावनाओं को दबा लेते हैं, जिससे उनके भीतर गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।
मानसिक अस्वस्थता के सामान्य कारण व लक्षण:
अवसाद और चिंता: परिवार का भरण-पोषण करने का दबाव, नौकरी या आजीविका के साधन की असुरक्षा और वित्तीय तनाव पुरुषों में चिंता और अवसाद के उच्च स्तर का कारण बनते हैं।
मादक पदार्थों का उपयोग: कई पुरुष भावनात्मक तनाव से बचने के लिए शराब, धूम्रपान या अन्य मादक पदार्थों का सहारा लेते हैं, जो उनके मानसिक और शारीरिक अस्वस्थता को और बढ़ाते हैं।
आत्महत्या के विचार: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार भारत में जितनी आत्महत्याएं होती हैं, उनमें 70% से अधिक संख्या पुरुषों की होती है।
कार्य संबंधित तनाव: लंबे कामकाजी घंटे, नौकरी की अस्थिरता और विफलता का डर पुरुषों के लिए स्वस्थ कार्य-जीवन को संतुलित बनाये रखना कठिन बना देते हैं। यह अंततः जलन और थकान का कारण बनता है।
पुरुष मदद क्यों नहीं मांगते?
जागरूकता की कमी: कई पुरुष यह समझ ही नहीं पाते कि जो कुछ वे अनुभव कर रहे हैं, वह एक मानसिक समस्या है जिसका इलाज किया जा सकता है।
निर्णय का डर: मानसिक स्वास्थ्य को लेकर पुरुष इस बात से भी डरते हैं कि अगर वे उपचार लेते हैं या अपनी समस्याओं के बारे में बात करते हैं, तो उन्हें विक्षिप्त या मानसिक रूप से कमजोर समझा जाएगा।
मानसिक चिकित्सा केन्द्रों की सीमित पहुंच: भारत में मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की कमी है, जिस कारण भी लोग विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों के लोग, मदद प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं।
महंगी चिकित्सा: मेंटल थेरेपी आमतौर पर महंगी होती है और यह आम लोगों की क्षमता के बाहर की बात होती है। दिक्कत यह भी है कि स्वास्थ्य बीमा योजना मानसिक स्वास्थ्य उपचार को कवर नहीं करतीं।
मानसिक समस्याओं से ग्रस्त लोगों का पुनर्वास कैसे किया जा सकता है?
खुली बातचीत को बढ़ावा देना: घर, कार्यस्थल और सामुदायिक केन्द्रों का माहौल ऐसा होना चाहिए जहां पुरुष अपनी भावनाओं के बारे में बिना डर के बात कर सके।
कार्यस्थल पर मानसिक चिकित्सा की देखभाल: एम्लायर को काउंसलिंग सेवाएं, तनाव प्रबंधन कार्यक्रम और लचीले कार्य घंटों की पेशकश करनी चाहिए ताकि कार्य संबंधित तनाव कम किया जा सके।
सस्ती और सुलभ थेरेपी: सरकार और निजी क्षेत्र को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सस्ता और सुलभ बनाने के लिए काम करना चाहिए, विशेष रूप से छोटे शहरों और गांवों में।
मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग: ऑनलाइन काउंसलिंग प्लेटफार्म, मानसिक स्वास्थ्य ऐप्स और गुमनाम हेल्पलाइन उन पुरुषों को जरूरी सहायता प्रदान कर सकते हैं जो खुले रूप से मदद लेने में संकोच करते हैं।
स्कूलों में भावनात्मक कल्याण की शिक्षा: अगर लड़के बचपन में यह सीखते हैं कि भावनाओं को व्यक्त करना सामान्य बात है, तो वे बड़े होकर मदद मांगने में संकोच नहीं करेंगे।
इस हेतु महिलाएं कैसे मदद कर सकती हैं?
महिलाएं पुरुषों के मानसिक कल्याण की देखभाल करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं, चाहे वे मां के रूप में हों या बहन, पत्नी अथवा मित्र के रूप में। खुली बातचीत को प्रोत्साहित करना, पुरुषों को यह विश्वास दिलाना कि वे ठीक हैं, धैर्यपूर्वक उनकी बातें सुनना, यह सब वे उपाय हैं जिनमें पैसे भी नहीं लगते हैं और यह दवा से ज्यादा काम भी करता है। समस्याग्रस्त पुरुषों के जीवन में यह उपाय बड़ा बदलाव ला सकता है। सो महिलाओं को चाहिए कि वे भावनात्मक अभिव्यक्ति को कमजोरी समझना बन्द कर दें और ऐसे वातावरण का निर्माण करें जहां पुरुष अपनी भावनाओं को साझा करने में सुरक्षित महसूस करें। दयालुता, सहानुभूति और समझ के छोटे-छोटे कार्य पुरुषों के आत्मबल को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं। इससे पुरुष अपने संघर्षों में कभी अकेला नहीं महसूस कर पाएंगे। अब समय आ गया है कि हम पुरानी रूढ़ियों को छोड़ें और एक ऐसी संस्कृति को बढ़ावा दें जहां हर पुरुष बिना शर्मिंदा हुए किसी से भी मदद मांग सकें।

