माउंट एवरेस्ट, दुनिया का सबसे ऊँचा पर्वत, हर पर्वतारोही का सपना और प्रकृति का एक अद्भुत अजूबा है। हिमालय की गोद में बसा यह शिखर न केवल अपनी ऊँचाई के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसके साथ जुड़े रोमांच, चुनौतियाँ, और इतिहास ने इसे एक वैश्विक प्रतीक बना दिया है। नेपाल और तिब्बत (चीन) की सीमा पर स्थित माउंट एवरेस्ट की ऊँचाई 8,848.86 मीटर (29,032 फीट) है, जो इसे पृथ्वी की सबसे ऊँची चोटी बनाती है। इस लेख में, हम माउंट एवरेस्ट के भूगोल, इतिहास, चढ़ाई की चुनौतियों, भारतीय पर्वतारोहियों के योगदान, और हाल की घटनाओं के बारे में विस्तार से जानेंगे।
माउंट एवरेस्ट का भूगोल और नामकरण
माउंट एवरेस्ट हिमालय पर्वत श्रृंखला के महालंगुर हिमाल उप-श्रेणी में स्थित है। यह नेपाल और तिब्बत (चीन) की सीमा पर 27°59′ उत्तर और 86°56′ पूर्व में बसा है। नेपाल में इसे सगरमाथा (स्वर्ग का शीर्ष) कहते हैं, जिसका नाम 1930 के दशक में नेपाली इतिहासविद बाबुराम आचार्य ने रखा। तिब्बत में इसे चोमोलुंगमा (पर्वतों की रानी) के नाम से जाना जाता है। 1852 में भारत के सरकारी सर्वेक्षण ने इसे दुनिया की सबसे ऊँची चोटी के रूप में पहचाना और 1865 में ब्रिटिश सर्वेयर जनरल एंड्रयू वॉ ने इसे अपने पूर्ववर्ती जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर माउंट एवरेस्ट नाम दिया, हालाँकि जॉर्ज एवरेस्ट ने इस नाम का विरोध किया था, क्योंकि इसे हिंदी में लिखना और उच्चारण करना कठिन था।
वैज्ञानिकों के अनुसार, माउंट एवरेस्ट की ऊँचाई हर साल लगभग 2 सेंटीमीटर बढ़ रही है, क्योंकि भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट्स की टक्कर से हिमालय ऊपर उठ रहा है। 2020 में नेपाल और चीन ने संयुक्त रूप से इसकी ऊँचाई 8,848.86 मीटर घोषित की।
माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई: इतिहास और चुनौतियाँ
माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना हर पर्वतारोही का सपना है, लेकिन यह आसान नहीं है। 1921 से ही इसकी चढ़ाई के प्रयास शुरू हुए, लेकिन कई बार असफलताएँ मिलीं। 29 मई, 1953 को न्यूज़ीलैंड के एडमंड हिलेरी और नेपाली शेरपा तेनजिंग नोर्गे ने दक्षिण-पूर्व रिज मार्ग से पहली बार इस शिखर को फतह किया, जिसे दुनिया की पहली आधिकारिक चढ़ाई माना जाता है। इस उपलब्धि की याद में हर साल 29 मई को अंतरराष्ट्रीय माउंट एवरेस्ट दिवस मनाया जाता है।
चढ़ाई के दो मुख्य मार्ग हैं: नेपाल की ओर से दक्षिण-पूर्व रिज (मानक मार्ग) और तिब्बत की ओर से उत्तरी रिज। दोनों मार्ग खतरनाक हैं, खासकर खुंबू आइसफॉल, जो हिमस्खलन और बर्फीली दरारों से भरा है। 8,000 मीटर से ऊपर का क्षेत्र, जिसे डेथ ज़ोन कहा जाता है, बेहद खतरनाक है। यहाँ ऑक्सीजन की कमी, ठंड, और तेज़ हवाएँ मस्तिष्क और शरीर को प्रभावित करती हैं। लगभग 95% पर्वतारोही ऑक्सीजन टैंक का उपयोग करते हैं, लेकिन बिना ऑक्सीजन के चढ़ाई का जोखिम दोगुना है। 2019 तक, 300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें से कई शव आज भी बर्फ में दफन हैं।
भारतीय पर्वतारोहियों का योगदान
भारत ने भी माउंट एवरेस्ट पर अपनी छाप छोड़ी है। 1965 में भारतीय सेना के कैप्टन अवतार सिंह चीमा पहले भारतीय बने, जिन्होंने इस शिखर पर तिरंगा फहराया। 1984 में बछेन्द्री पाल पहली भारतीय महिला बनीं, जिन्होंने एवरेस्ट फतह किया। हाल ही में, 27 मई, 2025 को लेफ्टिनेंट कर्नल भानु पाठक के नेतृत्व में भारतीय सेना के 22 पर्वतारोहियों ने माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई की, जो साहस और धैर्य का प्रतीक है। इसके अलावा, नेपाली शेरपा कामी रीता ने 2025 में 31वीं बार एवरेस्ट फतह कर अपना ही विश्व रिकॉर्ड तोड़ा।
पर्यावरणीय चुनौतियाँ और प्रदूषण
माउंट एवरेस्ट की लोकप्रियता ने इसे पर्यावरणीय संकट में डाल दिया है। हर साल सैकड़ों पर्वतारोही चढ़ाई के लिए आते हैं, जिससे कचरा, ऑक्सीजन सिलेंडर, और मानव अपशिष्ट जमा हो रहा है। खुंबू ग्लेशियर और अन्य क्षेत्रों में प्रदूषण बढ़ रहा है, जो हिमालय की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचा रहा है। नेपाल सरकार ने कचरा प्रबंधन के लिए नियम बनाए हैं, जैसे प्रत्येक पर्वतारोही को 8 किलो कचरा वापस लाने का आदेश। 2025 में नेपाल ने हिमालयी ग्लेशियर्स के पिघलने पर एक पर्यावरण सम्मेलन की मेजबानी की, जिसमें ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रभावों पर चर्चा हुई।
चढ़ाई का खर्च और तैयारी
माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई महँगी और जोखिम भरी है। एक औसत अभियान में 30-60 लाख रुपये का खर्च आता है, जिसमें परमिट (लगभग 11,000 डॉलर), गाइड, शेरपा, उपकरण, और ऑक्सीजन सिलेंडर शामिल हैं। चढ़ाई के लिए शारीरिक और मानसिक तैयारी जरूरी है। पर्वतारोहियों को महीनों तक प्रशिक्षण, ऊँचाई के अनुकूलन (एक्लिमटाइजेशन), और आपातकालीन योजनाओं की जरूरत होती है। हाल ही में, ब्रिटिश पर्वतारोहियों ने ज़ेनॉन गैस का उपयोग कर 5 दिनों में चढ़ाई पूरी की, जो सामान्य 2-3 सप्ताह की तुलना में क्रांतिकारी है।
माउंट एवरेस्ट का वातावरण और जीव-जंतु
माउंट एवरेस्ट का शिखर ठंडा और निर्जन है, जहाँ जीवन की संभावना न के बराबर है। खुंबू ग्लेशियर और आसपास के क्षेत्रों में हिम तेंदुए, याक, और कुछ पक्षी पाए जाते हैं, लेकिन ऊँचाई बढ़ने पर वनस्पति और जीव-जंतु गायब हो जाते हैं। यह पर्वत चूना पत्थर और सेडिमेंट्री चट्टानों से बना है। इसकी जलवायु अत्यंत ठंडी है, जहाँ तापमान -40 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है। माउंट एवरेस्ट हमें सिखाता है कि कोई भी शिखर असंभव नहीं, अगर हौसला और मेहनत साथ हों।


