मुकुल रॉय का निधन पश्चिम बंगाल की राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत है। वह केवल पूर्व रेल राज्य मंत्री नहीं थे, बल्कि संगठन की बारीकियों को समझने वाले ऐसे रणनीतिकार थे जिन्होंने सत्ता की संरचना को भीतर से गढ़ा और बदला।
उनका राजनीतिक सफर ममता बनर्जी Banerjee और All India Trinamool Congress के उदय से गहराई से जुड़ा रहा। 1990 के दशक के उत्तरार्ध में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की, तब मुकुल रॉय उनके सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में थे। वह मंच के नेता कम और संगठन के निर्माता अधिक थे। जिला स्तर से लेकर बूथ प्रबंधन तक उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती थी।
वाम मोर्चे के तीन दशक लंबे शासन को चुनौती देने में तृणमूल कांग्रेस को जिस संगठनात्मक मजबूती की आवश्यकता थी, उसे खड़ा करने में मुकुल रॉय की अहम भूमिका रही। उम्मीदवार चयन, गठबंधन रणनीति और कार्यकर्ताओं के नेटवर्क को सक्रिय रखना उनकी पहचान बन गई।
2011 में तृणमूल कांग्रेस की ऐतिहासिक जीत के बाद वह केंद्र में यूपीए सरकार के दौरान रेल राज्य मंत्री बने। उनका कार्यकाल भले ही बड़े सुधारों के लिए याद न किया जाए, लेकिन उन्होंने क्षेत्रीय दल और केंद्र सरकार के बीच संतुलन बनाने की क्षमता दिखाई।
समय के साथ पार्टी के भीतर मतभेद उभरे और मुकुल रॉय ने तृणमूल कांग्रेस से दूरी बना ली। 2017 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा। यह कदम पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा मोड़ था। भाजपा उस समय राज्य में अपने विस्तार की कोशिश कर रही थी, और मुकुल रॉय संगठनात्मक रणनीति के लिहाज से उसके लिए अहम साबित हुए।
2019 के लोकसभा चुनावों में बंगाल में भाजपा की उल्लेखनीय बढ़त के पीछे उनके अनुभव को महत्वपूर्ण माना गया। हालांकि 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद उन्होंने फिर से तृणमूल कांग्रेस में वापसी की। यह वापसी बताती है कि उनकी राजनीति वैचारिक कठोरता से अधिक व्यावहारिक गणित पर आधारित थी।
मुकुल रॉय का राजनीतिक जीवन भारतीय राजनीति के बदलते चरित्र को दर्शाता है। आज दलगत सीमाएं पहले जैसी स्थिर नहीं रहीं। क्षेत्रीय दल और राष्ट्रीय दल के बीच शक्ति संतुलन लगातार बदल रहा है। मुकुल रॉय इस परिवर्तन के सक्रिय भागीदार रहे।
वह जनसभाओं के करिश्माई वक्ता नहीं थे। उनकी ताकत पर्दे के पीछे रणनीति बनाने में थी। हाल के वर्षों में उनका स्वास्थ्य कमजोर बताया गया और सार्वजनिक जीवन में उनकी सक्रियता कम हो गई थी।
उनके निधन के साथ पश्चिम बंगाल ने एक ऐसे रणनीतिकार को खो दिया जिसने सत्ता की बारीकियों को गहराई से समझा। उनकी भूमिका पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि उन्होंने बंगाल की समकालीन राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
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