डूरंड रेखा पर आग

२७ फ़रवरी २०२६ की सुबह अभी रोशन भी नहीं हुई थी कि क़ाबुल धमाकों से थरथरा उठा। पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी, क़ंधार और पकतिया प्रांत में हमले किए। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने इस अभियान को “ऑपरेशन ग़ज़ब लिल हक़” यानी ‘न्यायोचित आक्रोश’ का नाम दिया। पाकिस्तान का कहना था कि अफ़ग़ान तालिबान ने पहले ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में उसकी कई सीमा चौकियों पर गोलीबारी की थी। क़ाबुल के रक्षा मंत्रालय ने इसे फ़रवरी महीने की पाकिस्तानी बमबारी का जवाब बताया जिसमें, उसके अनुसार, नागरिक मारे गए थे।

तोरख़म के पास एक व्यापारी ने एक पश्तो-भाषी प्रसारणकर्ता को बताया कि अमेरिकी वापसी के बाद से उसने इतनी क़रीब गोलाबारी नहीं सुनी थी। वह अपनी दुकान बंद करके अँधेरे में बैठ गया।

हताहतों की संख्या पर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। पाकिस्तान ने कहा कि उसने १३३ तालिबान लड़ाकों को मार गिराया और २७ सैन्य चौकियाँ तबाह कीं। अफ़ग़ानिस्तान ने दावा किया कि उसके बलों ने ५५ पाकिस्तानी सैनिकों को मारा और एक दर्जन से ज़्यादा पाकिस्तानी चौकियाँ क़ब्ज़े में लीं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने दोनों पक्षों से अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून का पालन करने की अपील की। रूस ने तत्काल युद्धविराम का आग्रह किया। ईरान के विदेश मंत्री ने मध्यस्थता का प्रस्ताव रखा। दुनिया ने देखा, बयान दिए। बम गिरते रहे।

यह संकट अचानक नहीं आया। यह ७७ वर्षों की अनसुलझी विरासत का नतीजा है। एक ऐसी विरासत जिसमें विवादित भूगोल, जनजातीय निष्ठाएँ, औपनिवेशिक नक्शानवीसी और यह कड़वी सच्चाई शामिल है कि एक धर्म को मानना, एक जैसे हित रखने की गारंटी नहीं होती।

इस्लाम काफ़ी नहीं था

इस्लामी सहयोग संगठन में ५७ सदस्य देश हैं। कोई इस्लामी महाराज्य नहीं है। ‘उम्मा’ यानी वैश्विक मुस्लिम समुदाय की अवधारणा हमेशा एक नैतिक विचार रही है। यह कभी एक ऐसी राजनीतिक इकाई नहीं बन सकी जो सीमा विवादों को सुलझाए, सरहदी बग़ावतों पर क़ाबू पाए या राष्ट्रीय संप्रभुता को दरकिनार करे।

पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान दोनों के संविधान इस्लामी पहचान पर खड़े हैं। फिर भी इस हफ़्ते वे खुले युद्ध की स्थिति में हैं। पाकिस्तान के अपने रक्षा मंत्री ने तालिबान सरकार पर यह आरोप लगाया कि उसने अफ़ग़ानिस्तान को भारत की “कॉलोनी” बना दिया है। आज की दुनिया में सबसे कट्टर इस्लामी शासन को भारत का उपनिवेश कहना, इस्लामी एकजुटता की सीमाओं को बिल्कुल साफ़ बता देता है।

यह पहली बार नहीं हुआ है। अरब देश दशकों से आपस में लड़ते रहे हैं। ईरान और इराक़ ने, दोनों मुस्लिम बहुल होते हुए भी, १९८० के दशक में आठ साल का युद्ध लड़ा जिसमें लाखों लोग मारे गए। दक्षिण एशिया में जातीयता, भूभाग और जनजातीय निष्ठा हमेशा धार्मिक भाईचारे से ज़्यादा टिकाऊ साबित हुई है। पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान इस पुराने नमूने की सबसे ताज़ा और सबसे हिंसक मिसाल हैं।

सत्तहत्तर साल पुरानी एक ख़राब सीमा

इस संघर्ष की जड़ औपनिवेशिक है और उसके नतीजे स्थायी। १८९३ में ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर मॉर्टिमर डूरंड ने पश्तून आदिवासी पट्टी के बीच से २,६११ किलोमीटर लंबी एक रेखा खींची। इसने एक ही जातीय समूह को दो प्रशासनिक क्षेत्रों में बाँट दिया। उन पश्तूनों से कोई सहमति नहीं ली गई जो इस रेखा के आसपास की पहाड़ियों और घाटियों में रहते थे।

जब १९४७ में पाकिस्तान अस्तित्व में आया, तो अफ़ग़ानिस्तान ने तत्काल इनकार कर दिया। क़ाबुल ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की सदस्यता के ख़िलाफ़ वोट किया और ऐसा करने वाला वह दुनिया का इकलौता देश था। कारण सीधा था। अफ़ग़ानिस्तान डूरंड रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं मानता था और आज भी नहीं मानता। पाकिस्तानी हिस्से में रहने वाले पश्तूनों का राजनीतिक भविष्य उसकी नज़र में अभी तय नहीं हुआ था। ‘पश्तूनिस्तान’ की माँग, यानी एक स्वतंत्र पश्तून मातृभूमि का विचार, अफ़ग़ान राजनीतिक विमर्श में दशकों तक उठती रही।

समस्या को और गहरा करती है इस इलाक़े की भूगोल। ख़ैबर दर्रा, मोहमंद की पहाड़ियाँ, कुर्रम घाटी, ये दुनिया के सबसे दुर्गम और सबसे मुश्किल से शासित इलाकों में से हैं। न इस्लामाबाद और न क़ाबुल ने कभी इन क्षेत्रों पर पूरा प्रशासनिक नियंत्रण हासिल किया। यह ख़ला हमेशा जनजातीय ढाँचों, जिरगाओं और सम्मान की स्थानीय संहिताओं से भरा गया जो दोनों आधुनिक राज्यों से पुरानी हैं।

क़बीला धर्म से बड़ा निकला

यह वह बात है जिसे बाहरी पर्यवेक्षक अक्सर नज़रअंदाज़ करते हैं। एक वज़ीरी क़बीले के शख़्स की पहली निष्ठा उसके कुनबे, उसकी घाटी और उसके क़बीले की आचार संहिता के प्रति होती है। पाकिस्तानी राज्य और अफ़ग़ान राज्य दोनों उसके लिए एक हद तक अमूर्त अवधारणाएँ हैं। यह पिछड़ापन नहीं है। यह एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसकी अपनी तर्क-प्रणाली और अपने विवाद-समाधान के तरीक़े हैं।

यही कारण है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP), जिस पर पाकिस्तान में हज़ारों लोगों की हत्या का आरोप है, के अफ़ग़ान तालिबान के साथ गहरे जनजातीय और पारिवारिक संबंध हैं। कई अफ़ग़ान तालिबान नेताओं की संपत्ति और परिवार अभी भी पाकिस्तान में हैं। अफ़ग़ान तालिबान की TTP के ख़िलाफ़ क़दम उठाने में हिचकिचाहट महज़ वैचारिक एकजुटता नहीं है, बल्कि जनजातीय एकजुटता है। पश्तून जनजातीय नेटवर्क सरहद के दोनों तरफ़ फैले हैं और किसी सैन्य अभियान से नहीं काटे जा सकते।

२०२५ में पाकिस्तान में आतंकवादी हमलों में १,२०० से अधिक लोग मारे गए जो कि २०२१ की तुलना में दोगुनी संख्या है। पाकिस्तानी सेना का धैर्य अचानक नहीं टूटा। यह चार साल से धीरे-धीरे घिसता रहा।

पाकिस्तान का अपने हाथों से बनाया दुश्मन

इसे समझने के लिए १९९० के दशक में जाना होगा। पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ISI ने तालिबान को एक रणनीतिक औज़ार के रूप में तैयार किया था। सोच यह थी कि क़ाबुल में एक मैत्रीपूर्ण पश्तून सरकार पाकिस्तान को भारत के ख़िलाफ़ “सामरिक गहराई” देगी। तालिबान का पाकिस्तान के क्वेटा और पेशावर में बसे पश्तून शरणार्थी समुदायों से गहरा नाता था।

“सामरिक गहराई” का यह विचार कभी बहुत ठोस नहीं था। यह धारणा कि एक परमाणु संपन्न और बीस करोड़ की आबादी वाले देश को भारत से युद्ध की स्थिति में पीछे हटने के लिए एक मैत्रीपूर्ण अफ़ग़ान सरकार की ज़रूरत होगी, पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान की घेराबंदी की मानसिकता को दर्शाती है। भारत का कभी अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते थल-युद्ध लड़ने का कोई इरादा नहीं रहा। सामरिक गहराई का सिद्धांत, पूरे दृष्टिकोण से देखें तो, एक इच्छा थी जिसे अवधारणा का रूप दे दिया गया।

२००१ में अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान में आने के बाद पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर वाशिंगटन के साथ हो गया, लेकिन कई पश्चिमी ख़ुफ़िया आकलनों के अनुसार उसने तालिबान गुटों से छुपे संबंध बनाए रखे। अगस्त २०२१ में तालिबान क़ाबुल में वापस सत्ता में आ गया। फिर हिसाब चुकाने का वक़्त आया।

सत्ता में आने के बाद तालिबान ने पाकिस्तान के मोहरे की तरह नहीं बल्कि एक स्वतंत्र पश्तून राष्ट्रवादी सरकार की तरह काम किया। उसने TTP के ख़िलाफ़ कोई ठोस क़दम उठाने से इनकार किया। उसने डूरंड रेखा को मानने से इनकार किया। उसने भारत के साथ कूटनीतिक संपर्क बढ़ाए। पाकिस्तान ने दशकों तक जिस तालिबान को तैयार किया था, उसने सत्ता में आकर धन्यवाद कहा और अपनी राह चला गया।

मौजूदा संघर्ष से पहले पाकिस्तान ने २१ फ़रवरी को भी TTP और ISIS-ख़ोरासान के ठिकानों को निशाना बनाते हुए अफ़ग़ानिस्तान में हमले किए थे। यह टकराव कहीं से नहीं उठा। यह महीनों की बढ़ती तनातनी, एक अधूरे क़तर-मध्यस्थ युद्धविराम और आरोप-प्रत्यारोप की उस लंबी शृंखला का नतीजा है जिसे कोई भी पक्ष तोड़ नहीं पाया।

क़ाबुल की नज़र दिल्ली पर क्यों?

अफ़ग़ानिस्तान ज़मीन से घिरा देश है। भारतीय बाज़ारों तक पहुँचने के लिए उसे पाकिस्तानी ज़मीन से गुज़रना होता था। पाकिस्तान ने इस लाभ का बार-बार इस्तेमाल किया। जब भी रिश्ते बिगड़े, पारगमन रोक दिया गया।

भारत ने इसका जवाब अलग तरह से दिया। उसने हेरात में सलमा बाँध बनाया। ज़रंज-दिलाराम राजमार्ग बनाया जो अफ़ग़ानिस्तान को ईरान के चाबहार बंदरगाह से जोड़ता है। क़ाबुल में संसद भवन का निर्माण किया। ये परोपकार के काम नहीं थे। ये भू-राजनीतिक निवेश थे जो जानबूझकर पाकिस्तानी क्षेत्र को दरकिनार करते हुए बनाए गए।

मौजूदा तालिबान सरकार, जिसके विश्वदृष्टिकोण का भारत के संवैधानिक उदारवाद से कोई मेल नहीं, वह भी नई दिल्ली के साथ संबंध में रणनीतिक मूल्य देखती है। भारत ने २०२१ के बाद क़ाबुल में अपना दूतावास फिर से खोला। तालिबान ने दरवाज़ा बंद नहीं किया। दोनों पक्षों का एक स्थिर अफ़ग़ानिस्तान में फ़ायदा है जो पाकिस्तान की मर्ज़ी पर निर्भर न हो। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री का अफ़ग़ानिस्तान को भारत की “कॉलोनी” कहना बताता है कि भारत-अफ़ग़ानिस्तान रिश्ता इस्लामाबाद को किस हद तक ख़तरनाक लगता है।

चाबहार बंदरगाह में भारत का निवेश इस पूरी रणनीतिक बनावट की बुनियाद है। यह अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया को एक वैकल्पिक व्यापार गलियारा देता है जिसके लिए पाकिस्तानी सहयोग की कोई ज़रूरत नहीं।

बांग्लादेश का पहलू

यह थोड़ा अलग कोण है लेकिन इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। २०२४ में शेख़ हसीना की सरकार के जाने और मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के आने के बाद बांग्लादेश की विदेश नीति में एक सतर्क लेकिन दिखने लायक़ बदलाव आया। पाकिस्तान के साथ रिश्ते, जो १९७१ के ज़ख़्मों और हसीना की भारत-समर्थक नीति की वजह से दशकों तक जमे हुए थे, पिघलने लगे।

भारत के लिए यह मायने रखता है। बांग्लादेश हमेशा से भारत के पूर्वी पड़ोस का सबसे स्थिर हिस्सा रहा है। एक ऐसा बांग्लादेश जो इस्लामाबाद की तरफ़ झुके और जहाँ चीन की आर्थिक उपस्थिति भी गहरी होती जाए, भारत के पूर्वी हिस्से में एक अलग भू-राजनीतिक समीकरण खड़ा करता है। यह कोई षड्यंत्र नहीं, एक छोटे देश का सामान्य कूटनीतिक संतुलन-साधना है। लेकिन नई दिल्ली के पड़ोस-समीकरण के लिए इसके नतीजे असली हैं।

ईरान, अमेरिका और एक थका हुआ क्षेत्र

ईरान के विदेश मंत्री ने इस हफ़्ते पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की। यह पेशकश रमज़ान की पवित्रता के नाम पर की गई। तेहरान की यह दिलचस्पी निःस्वार्थ नहीं है। अफ़ग़ानिस्तान के साथ उसकी लंबी सीमा है। वहाँ हज़ारा शिया समुदाय है जिसे ईरान अपना संरक्षण क्षेत्र मानता है। और यदि संघर्ष बढ़ा तो शरणार्थियों का सैलाब आने का ख़तरा उसे परेशान करता है।

ईरान और पाकिस्तान के बीच भी अपने पुराने तनाव हैं। जनवरी २०२४ में दोनों ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हमले किए थे। ईरान ने पाकिस्तानी बलूचिस्तान में जैश-ए-अदल के ठिकानों को निशाना बनाया था, पाकिस्तान ने जवाब दिया। मामला जल्दी शांत हुआ लेकिन इस क्षेत्र की नाज़ुकता उजागर हो गई।

अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु विवाद इस अस्थिरता में एक और परत जोड़ता है। ऊर्जा क़ीमतों से लेकर शरणार्थी संकट तक और हर देश की रणनीतिक गणनाओं तक, कोई भी बड़ी ग़लती पूरे क्षेत्र को हिला सकती है।

भारत देख रहा है, बोल नहीं रहा

“ऑपरेशन ग़ज़ब लिल हक़” पर भारत ने सार्वजनिक रूप से लगभग कुछ नहीं कहा है। यह चुप्पी नीति है, अनुपस्थिति नहीं।

नई दिल्ली के हित इस संघर्ष में कई स्तरों पर और कुछ हद तक परस्पर विरोधी हैं। एक कमज़ोर पाकिस्तानी सेना, ख़ासकर मई २०२५ की तनातनी के बाद, नई दिल्ली के लिए असुविधाजनक नहीं है। भारत के साथ जुड़ाव बनाए रखने वाला एक स्थिर अफ़ग़ानिस्तान दीर्घकालिक हितों के अनुकूल है। लेकिन एक ऐसा पाकिस्तान जो वास्तविक राज्य-विफलता की कगार पर पहुँच जाए, वह किसी के लिए लाभदायक नहीं है। भारत की पश्चिमी सीमा पर एक परमाणु संपन्न और आर्थिक रूप से टूटा हुआ देश रणनीतिक संपत्ति नहीं, बोझ है।

इसलिए भारत वही करता है जो वह हमेशा क्षेत्रीय उथल-पुथल में करता है। चाबहार गलियारा चालू रखता है। क़ाबुल से संबंध बनाए रखता है। इस्लामाबाद के आंतरिक टकरावों को ध्यान से देखता है। और कुछ नहीं कहता जो उसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो सके।

चीन और बिना छत का क्षेत्र

दक्षिण एशियाई अस्थिरता की कोई ईमानदार तस्वीर चीन को छोड़कर पूरी नहीं हो सकती। बीजिंग लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश तक भारत पर लगातार भू-क्षेत्रीय दबाव बनाता है। वह पाकिस्तान को आर्थिक और कूटनीतिक संबल देता है। साथ ही वह अफ़ग़ानिस्तान को बेल्ट एंड रोड पहल के विस्तार के रूप में देखता है। एक स्थिर अफ़ग़ानिस्तान उसे इसलिए चाहिए ताकि शिनजियांग सुरक्षित रहे। पाकिस्तान को मज़बूत इसलिए रखना है ताकि वह भारत के प्रतिसंतुलन का काम करे। ये दोनों हित हमेशा एक-दूसरे के अनुकूल नहीं होते। चीन इस अंतर्विरोध को दशकों की दृष्टि से संभालता है।

समग्र तस्वीर गंभीर है। चीन का आक्रामक रवैया, पाकिस्तान का अफ़ग़ानिस्तान में सैन्य साहसवाद, अफ़ग़ानिस्तान की नाज़ुक स्थिति, बांग्लादेश का राजनीतिक बदलाव, ईरान का परमाणु दाँव और अमेरिका की अनिश्चित प्राथमिकताएँ, ये सब एक साथ सक्रिय हैं। SAARC वर्षों से ठप है। कोई क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचा काम नहीं कर रहा। शीत युद्ध के बाद दक्षिण एशिया इतना परतदार और इतना घना संकट एक साथ पहले कभी नहीं झेल चुका।

आगे क्या?

फ़िलहाल सबसे ज़रूरी काम गोलाबारी रोकना है। रूस, संयुक्त राष्ट्र और ईरान सभी बोल चुके हैं। अगले कुछ घंटों में कोई युद्धविराम होगा या नहीं, यह दो बातों पर निर्भर करेगा। पहली, क्या पाकिस्तानी सेना यह मानती है कि उसका सैन्य संदेश पहुँच गया। दूसरी, क्या अफ़ग़ान तालिबान आगे और तनाव बढ़ाने में अपना हित देखता है।

लेकिन बुनियादी सवाल किसी युद्धविराम से हल नहीं होंगे। डूरंड रेखा क़ाबुल के लिए अमान्य रहेगी। TTP अफ़ग़ान ज़मीन का इस्तेमाल करता रहेगा। जनजातीय नेटवर्क अपनी तर्क-प्रणाली से चलते रहेंगे। पाकिस्तान घेरा महसूस करता रहेगा। अफ़ग़ानिस्तान भारत, ईरान और दूसरों के साथ संबंध बनाए रखेगा।

इस्लाम की छतरी काम नहीं आई। पश्तून जनजातीय पहचान धार्मिक भाईचारे से ज़्यादा मज़बूत निकली। औपनिवेशिक सीमाएँ उतनी विस्फोटक निकलीं जितना किसी ने १९४७ में नहीं सोचा था। और बड़ी शक्तियाँ, विकर्षित अमेरिका, विस्तारवादी चीन, पुनर्स्थापित होता रूस, एक ऐसा ख़ला छोड़ गई हैं जिसे भरने की क्षमता या विश्वसनीयता किसी क्षेत्रीय खिलाड़ी के पास नहीं है।

तोरख़म का वह व्यापारी जो अपनी बंद दुकान में अँधेरे में बैठकर धमाकों की आवाज़ें सुन रहा था, उसने यह सीमा नहीं बनाई थी। उसके पिता ने भी नहीं। एक अंग्रेज़ अफ़सर ने १८९३ में क़लम उठाई और एक रणनीतिक मक़सद से एक लकीर खींच दी जो कभी की बेमानी हो चुकी है। सैन्य अभियान किसी चौकी को हफ़्तों के लिए ख़ामोश कर सकते हैं। वे उस सवाल का जवाब नहीं दे सकते जो मॉर्टिमर डूरंड ने एक सदी से भी पहले अनुत्तरित छोड़ा था। व्यापारी एक दिन अपनी दुकान खोलेगा। सीमा वहीं रहेगी, ठीक वहाँ जहाँ डूरंड ने उसे रखा था, उतनी ही अर्थहीन जितनी वह हमेशा से थी।

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