असम की सांस्कृतिक धरोहर में गहरा योगदान देने वाले प्रसिद्ध नागारा नाम कलाकार रामचरण भराली का गुरुवार रात निधन हो गया। जानकारी के अनुसार, उन्होंने रात का भोजन करने के बाद अचानक तबीयत बिगड़ने पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से पूरे नलबाड़ी जिले में शोक की लहर दौड़ गई है। कला जगत, उनके शिष्य और प्रशंसक उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
रामचरण भराली असम के लोकसंगीत और नागारा नाम परंपरा के सबसे प्रतिष्ठित नामों में से एक थे। उन्होंने दशकों तक इस पारंपरिक लोकवाद्य कला को जीवित रखने का कार्य किया। जहां आज आधुनिक संगीत की धुनें हावी हैं, वहीं भराली ने नागारा नाम की ताल को घर-घर तक पहुंचाया। उन्होंने न केवल इसे मंचों तक सीमित रखा, बल्कि नई पीढ़ी को सिखाकर इस परंपरा को जीवित बनाए रखा।
असम नाट्य संमिलनी ने उनके असाधारण योगदान को देखते हुए उन्हें ‘नागारा सूर्य’ की उपाधि दी थी। यह सम्मान उन्हें उस कला के लिए मिला जिसने असम के लोकसंगीत की आत्मा को जन-जन तक पहुंचाया। उनके प्रदर्शन असम के त्योहारों, मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों में खास आकर्षण का केंद्र रहते थे।
भराली उन कुछ लोककलाकारों में से एक थे जिन्हें राज्य सरकार की ओर से जीवनभर के लिए पेंशन प्राप्त हुई थी। यह उनके अथक प्रयासों और लोकसंगीत के प्रति उनकी निष्ठा का सम्मान था। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय नागारा नाम की साधना में बिताया। उनकी प्रस्तुति में परंपरा की गंभीरता के साथ-साथ जनमानस की भावना झलकती थी।
वे अपने अंतिम दिनों तक भी मंच पर सक्रिय रहे। उम्र के बावजूद उनके हाथों की लय और आवाज की शक्ति में कोई कमी नहीं आई थी। उनकी प्रस्तुति देखने वाले बताते हैं कि वे जब नागारा बजाते थे, तो पूरा वातावरण गूंज उठता था। यह सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि असम की मिट्टी की आवाज होती थी।
रामचरण भराली का घर हमेशा कलाकारों और विद्यार्थियों से भरा रहता था। वे अपने शिष्यों को न केवल वाद्य सिखाते थे, बल्कि उन्हें यह भी बताते थे कि कला का असली अर्थ अनुशासन और आत्मा से जुड़ाव है। उनके कई शिष्य आज असम और पूर्वोत्तर भारत के अलग-अलग हिस्सों में लोकसंगीत को आगे बढ़ा रहे हैं।
उनके निधन के बाद शुक्रवार सुबह से ही उनके घर पर लोगों की भीड़ जुट गई। स्थानीय लोग, कलाकार, और सांस्कृतिक संगठनों के प्रतिनिधि उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे। कई लोगों ने कहा कि भराली का जाना असम की लोकसंस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
आज जब आधुनिक संगीत और तकनीकी धुनें लोककला की जगह ले रही हैं, तब रामचरण भराली जैसे कलाकार हमें यह याद दिलाते हैं कि असली संगीत उस मिट्टी में बसता है जो हमारी जड़ों से जुड़ी है। उन्होंने साबित किया कि परंपरा सिर्फ अतीत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवंत धरोहर है।
रामचरण भराली अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ताल, लय और संगीत की आत्मा असम की धरती पर सदियों तक गूंजती रहेगी। उनकी बनाई हुई यह सांस्कृतिक विरासत न केवल असम, बल्कि पूरे भारत के लोकसंगीत को नई पहचान देती रहेगी।
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