सुबह के छह बजे हैं। चारों ओर हल्का अंधेरा है, बादल बरस रहे हैं, और सड़कें कीचड़ से भर चुकी हैं। कुछ लोग अभी अपनी चाय के कप के साथ खिड़की से बाहर झांक रहे होंगे, लेकिन कहीं न कहीं कोई सफाईकर्मी झाड़ू उठाकर गली के कोने में पहुंच चुका है।
पैरों में सस्ते रबर की चप्पलें हैं और शरीर पर एक पुराना पॉलिथीन लिपटा है, जो अब पानी से चिपक कर भारी हो गया है। उसकी नज़र नाले पर है, जो कचरे और पानी से लबालब भरा है। वह चुपचाप झाड़ू मारता है, क्योंकि अगर वह नहीं करेगा, तो मोहल्ला फिर से डूब जाएगा।
हर बारिश में सबसे पहले यही लोग पहुंचते हैं
जब बारिश तेज़ होती है, स्कूल बंद हो जाते हैं, दफ्तर देर से खुलते हैं, ट्रैफिक रुक जाता है। लेकिन नगर निगम के सफाईकर्मी और कर्मचारी उसी समय काम पर निकलते हैं। वे कीचड़ से लथपथ नालियों में उतरते हैं, फटे दस्तानों से कचरा उठाते हैं, कभी-कभी नंगे हाथों से। उनके पास महंगे उपकरण नहीं होते, सिर्फ़ एक झाड़ू, एक डंडा और होता है सालों पुराना अनुभव।
इनकी उपस्थिति से ही सुबह की सड़कें कुछ हद तक चलने लायक बनती हैं। लेकिन इन्हें शायद ही कोई देखता है या सराहता है।
जब बिजली चली जाती है, तब असली मेहनत शुरू होती है
सड़क पर पानी भरने से कहीं ज़्यादा परेशानी तब होती है जब ट्रांसफॉर्मर फटता है, तार टूटते हैं और पूरा इलाका अंधेरे में डूब जाता है। तब बिजली विभाग के कर्मचारी बाहर निकलते हैं। ये लोग खंभों पर चढ़ते हैं, गीले तारों को संभालते हैं, और जान जोखिम में डालकर बिजली वापस लाते हैं।
उनके पास ना तो सुरक्षा उपकरण होते हैं, ना बीमा। लेकिन फिर भी, काम करना पड़ता है, क्योंकि शहर को बिजली चाहिए, चाहे जो भी हो।
इनके लिए कोई तालियां नहीं बजतीं
हमने महामारी में ताली बजाई, थाली बजाई। लेकिन इन कर्मियों के लिए न कोई पोस्ट होती है, न कोई मोमबत्तियां जलती हैं। नाले से गंदगी खींचता व्यक्ति, बिजली के खंभे पर बारिश में चढ़ा कर्मचारी ये सब केवल नज़रअंदाज़ हो जाते हैं।
ये “हीरो” नहीं कहे जाते, ये बस “ठेके के लोग” या “नगर निगम वाले” बनकर रह जाते हैं।
जोखिम से भरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी
हर मानसून में देश के अलग-अलग हिस्सों से खबरें आती हैं कि सफाईकर्मी नाले में गिरकर मारे गए, बिजली की मरम्मत करते हुए झुलस गए। कई मामलों में रिपोर्ट तक दर्ज नहीं होती। मुआवज़ा महीनों तक अटका रहता है। परिवार भी खामोश रह जाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि उनकी आवाज़ शायद कोई नहीं सुनेगा।
जो दूसरों की गलियां बचाते हैं, खुद पानी में रहते हैं
यह विडंबना ही है कि जो लोग शहर को जलभराव से बचाते हैं, वे खुद अक्सर ऐसी बस्तियों में रहते हैं जहां हर साल पानी भरता है।
वे दूसरों की सड़कों से पानी निकालते हैं, लेकिन उनके अपने घरों में फर्श पर पानी होता है, छतें टपकती हैं और बिजली कई-कई घंटो तक नहीं आती।
शहर को इनका कर्ज़ चुकाना होगा
हम शहरों को स्मार्ट बनाना चाहते हैं। बड़े-बड़े बजट बनते हैं, एप्स और सेंसर्स लगाए जाते हैं। लेकिन अगर ज़मीन पर काम करने वाले ये लोग सुरक्षित नहीं हैं, तो कोई भी योजना काम नहीं आएगी।
बदलाव वहीं से शुरू होगा, जहां इन लोगों को समय पर वेतन, सुरक्षा उपकरण, बीमा और सम्मान मिलेगा। शहर तभी टिकेगा, जब उसे संभालने वालों की भी परवाह की जाएगी।
अगली बार जब बारिश में सड़क पर चलने लायक जगह दिखे, तो याद रखिए, किसी ने वो पानी पहले अपने पैरों से पार किया है। किसी ने बिना कहे, बिना मांगे आपकी बिजली और सफाई लौटाई है। उनके नाम शायद किसी रिकॉर्ड में नहीं होंगे, लेकिन उनकी मेहनत हर कोने में मौजूद है।
ज़रूरत है तो सिर्फ़ उन्हें देखने की।

