सलीमा टेटे। यह सिमडेगा जिले की रहने वाली है। यह एक ऐसी महिला है जो हॉकी के मैदान में चमकी और अपने समुदाय के लिए मिसाल बन गई। एक ऐसी महिला की कहानी आज हम जानेंगे जो खेल, साहस और बदलाव से भरी है। यह सिर्फ़ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं, बल्कि झारखंड की एक बेटी की उम्मीद की किरण है। आइए, बात करते हैं उस गाँव से लेकर हॉकी के मैदान तक, जहाँ सलीमा ने इतिहास रचा।

सलीमा टेटे का जन्म झारखण्ड में २७ दिसम्बर २००१ को हुआ था।। उनका परिवार आदिवासी था, और जिंदगी आसान नहीं थी। गाँव में बिजली, पानी और शिक्षा जैसी सुविधाएँ मुश्किल से मिलती थीं। सलीमा के माता-पिता खेतों में काम करते थे। बचपन में सलीमा ने देखा कि गाँव की महिलाएँ कितना संघर्ष करती हैं। फिर भी, उनके मन में कुछ बड़ा करने की चाह थी।

सलीमा को पढ़ाई और खेल दोनों से प्यार था। लेकिन गाँव में स्कूल दूर था, और लड़कियों की पढ़ाई को तवज्जो कम मिलती थी। फिर भी, सलीमा ने हार नहीं मानी। वो रोज़ पैदल स्कूल जाती थीं और हॉकी स्टिक थामकर मैदान में उतरती थीं। उनकी इस जिद ने परिवार को प्रेरित किया।

सलीमा टेटे अपनी शानदार डिफेंस के लिए मशहूर हैं। झारखंड की इस बेटी ने हॉकी में अपनी जगह मेहनत से बनाई। 2018 में ब्यूनस आयर्स यूथ ओलंपिक में उन्होंने भारतीय जूनियर टीम की कप्तानी की और रजत पदक जीता। यह उनकी पहली बड़ी उपलब्धि थी। सलीमा यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने सीनियर टीम में जगह बनाई और टोक्यो 2020 ओलंपिक में भारत को चौथा स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

सलीमा यूनाइटेड स्टेट्स के खिलाफ FIH ओलंपिक क्वालीफायर जीत में भी स्टार रहीं। 2022 में महिला एशिया कप में भारत के तीसरे स्थान और बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक जीतने में उनकी मिडफील्ड की ताकत अहम थी। 2021-22 FIH हॉकी प्रो लीग में भी भारत को तीसरा स्थान दिलाने में सलीमा का योगदान बड़ा था।

मई 2024 में सलीमा टेटे के नाम एक और उपलब्धि जुड़ी। उन्हें FIH हॉकी प्रो लीग 2023-24 के यूरोप चरण के लिए पहली बार भारतीय महिला हॉकी टीम का कप्तान बनाया गया। यह उनके लिए गर्व का पल था। निक्की प्रधान के बाद सलीमा झारखंड की दूसरी खिलाड़ी हैं जो ओलंपिक में खेलीं। उनकी कप्तानी ने युवा खिलाड़ियों को प्रेरित किया और दिखाया कि मेहनत से कोई भी सपना सच हो सकता है।

हॉकी के मैदान में चमकने के साथ-साथ सलीमा ने अपने गाँव को भी नहीं भूला। उन्होंने फैसला किया कि वो अपने समुदाय की तस्वीर बदलेंगी। सलीमा ने आदिवासी अधिकारों के लिए काम शुरू किया। वो गाँव-गाँव गईं और लोगों को उनके हक़ के बारे में बताया। उनकी बातों में सादगी और दम था। वो आसान शब्दों में समझाती थीं कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार सबके लिए ज़रूरी हैं।

सलीमा ने महिलाओं को एकजुट करना शुरू किया। उन्होंने छोटे-छोटे समूह बनाए, जहाँ महिलाएँ अपनी समस्याएँ बताती थीं। इन समूहों ने गाँव में बदलाव की लहर ला दी। महिलाएँ अब अपनी बात खुलकर रखने लगीं। सलीमा ने उन्हें सिखाया कि वो खुद अपने लिए आवाज़ उठा सकती हैं।

सलीमा टेटे की कहानी सिर्फ़ उनके गाँव या हॉकी के मैदान तक सीमित नहीं है। उनकी आवाज़ पूरे झारखंड में गूँजती है। उन्होंने कई संगठनों के साथ मिलकर गाँवों में स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र खुलवाए। सलीमा ने आदिवासी महिलाओं को स्वरोज़गार के लिए प्रेरित किया। वो खेती, हस्तशिल्प और छोटे व्यवसायों को बढ़ावा देती थीं।

एक बार सलीमा ने गाँव में पानी की समस्या हल करने के लिए अभियान चलाया। गाँव का एकमात्र कुआँ सूख गया था। सलीमा ने अधिकारियों से बात की और गाँव वालों को साथ लिया। महीनों की मेहनत के बाद नया पानी का स्रोत बना। यह छोटी जीत थी, लेकिन गाँव वालों के लिए बहुत बड़ी।

सलीमा का रास्ता आसान नहीं था। हॉकी में सफलता के लिए उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ी। गाँव में बदलाव लाने के लिए भी उन्हें विरोध झेलना पड़ा। कुछ लोग नहीं चाहते थे कि आदिवासी समुदाय, खासकर महिलाएँ, आगे बढ़ें। सलीमा को धमकियाँ भी मिलीं। लेकिन वो कभी पीछे नहीं हटीं। उनकी हिम्मत और साफ़ नीयत ने सबका दिल जीत लिया।

आज सलीमा एक मिसाल हैं। उनकी वजह से गाँवों में स्कूलों में बच्चे बढ़े हैं। महिलाएँ अपने हक़ के लिए लड़ रही हैं। हॉकी के मैदान में उनकी उपलब्धियाँ युवाओं को प्रेरित करती हैं। सलीमा टेटे की कहानी अब पूरे देश के लिए प्रेरणा है। वो युवाओं को सिखाती हैं कि सपनों को कभी न छोड़ें। वो महिलाओं को बताती हैं कि वो किसी से कम नहीं हैं। सलीमा की मेहनत ने न सिर्फ़ उनके समुदाय को बदला, बल्कि समाज की सोच को भी बदला।

उनके काम को कई पुरस्कार मिले हैं। लेकिन सलीमा कहती हैं कि असली पुरस्कार गाँव वालों की मुस्कान और मैदान की जीत है। जब वो किसी बच्चे को स्कूल जाते या किसी महिला को आत्मनिर्भर बनते देखती हैं, तो उन्हें सुकून मिलता है।

सलीमा की कहानी हमें सिखाती है कि मेहनत और हिम्मत से कुछ भी मुमकिन है। चाहे आप हॉकी के मैदान में हों या गाँव की गलियों में, अगर इरादा पक्का हो, तो कोई मुश्किल बड़ी नहीं। सलीमा ने दिखाया कि एक व्यक्ति समाज और खेल दोनों में बदलाव ला सकता है।

सलीमा आज भी अपने मिशन पर डटी हैं। वो चाहती हैं कि हर आदिवासी बच्चा स्कूल जाए। हर महिला आत्मनिर्भर बने। हॉकी के मैदान में वो नई ऊँचाइयाँ छूना चाहती हैं। उनकी कहानी खत्म नहीं हुई है। वो अभी भी नए सपने देख रही हैं और उन्हें सच कर रही हैं।

सलीमा टेटे की कहानी हमें याद दिलाती है कि असली ताकत हमारे अंदर होती है। बस उसे जगाने की ज़रूरत है। तो, आप क्या बदलाव लाना चाहते हैं? सलीमा की तरह शुरुआत करें। एक कदम, फिर दूसरा, और देखिए कैसे दुनिया बदलती है।

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Journalist, News Writer, Sub-Editor

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