11 जून 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने देश भर की उन करोड़ों महिलाओं के काम को आधिकारिक मान्यता दे दी, जो कभी वेतन नहीं लेतीं, लेकिन जिनके बिना हर घर की नींव हिल जाए। अदालत ने साफ कहा कि एक गृहिणी को ‘बिना कमाई वाली आश्रित’ कहना न सिर्फ गलत है, बल्कि न्याय के खिलाफ भी है।

क्या था यह मामला?

यह मामला हरियाणा के सिरसा से जुड़ा है। 25 नवंबर 2001 को एक गृहिणी की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी वह सिरसा से फतेहाबाद जा रही थीं जब एक वाहन ने उन्हें टक्कर मार दी। पति और परिवार ने सिरसा के वाहन दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण में मुआवजे की अर्जी लगाई। दिसंबर 2003 में न्यायाधिकरण ने महज ₹2.42 लाख का मुआवजा दिया।

परिवार इससे संतुष्ट नहीं था और 2004 में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय पहुंचा। लेकिन 2011 में न्यायालय परिसर में भीषण आग लगने से हजारों फाइलें जल गईं या नष्ट हो गईं इस मामले की फाइल भी उनमें से एक थी। इसके बाद दस्तावेज फिर से तैयार करने की लंबी प्रक्रिया चली। अंततः फरवरी 2024 में प्रशासनिक निर्देशों के बाद उच्च न्यायालय ने दिसंबर 2024 में अपील निपटाई और मुआवजा बढ़ाकर ₹8.43 लाख किया। परिवार फिर भी संतुष्ट नहीं हुआ और विशेष अनुमति याचिका लेकर सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। यह मामला शिशु पाल उर्फ शीश राम एवं अन्य बनाम सुरजीत एवं अन्य (2026 INSC 634) के नाम से दर्ज हुआ।

सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति संजय कारोल और न्यायमूर्ति नोंग्मेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने 11 जून 2026 को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने परिवार का मुआवजा बढ़ाकर ₹62,77,900 कर दिया  यानी उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए ₹8.43 लाख से सात गुना से भी अधिक।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अदालत ने ‘घरेलू देखभाल की क्षति’ के नाम से एक नया और स्वतंत्र मुआवजा शीर्ष बनाया। इसके तहत वाहन दुर्घटना मामलों में किसी गृहिणी की मौत होने पर हर महीने ₹30,000 की राशि मुआवजे में अनिवार्य रूप से जोड़ी जाएगी। यह राशि हर तीन वर्ष में 10 प्रतिशत की दर से बढ़ती रहेगी।

अदालत ने कहा कि यह विडंबना की बात है कि गृहिणी को घर के कमाने वाले सदस्य पर ‘आश्रित’ कहा जाता है, जबकि असल में घर का पूरा कामकाज खुद गृहिणी पर निर्भर करता है। न्यायमूर्ति कारोल ने कहा, “हम उम्मीद और भरोसा करते हैं कि अब ‘गृहिणी’ शब्द का संक्षिप्त रूप राष्ट्र निर्माता हो जाएगा।”

पहले क्या होता था? पुराने फैसलों से तुलना

यह पहली बार नहीं है जब सर्वोच्च न्यायालय ने गृहिणियों के आर्थिक योगदान को मान्यता दी है, लेकिन इस बार का फैसला पिछले सभी फैसलों से एक बड़ा कदम आगे है।

2010 में अरुण कुमार अग्रवाल बनाम राष्ट्रीय बीमा कंपनी लिमिटेड के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि गृहिणी का परिवार के लिए योगदान अमूल्य है। उस समय काल्पनिक आय तय करने के लिए कमाने वाले पति की आय का एक-तिहाई हिस्सा आधार माना जाता था।

2021 में किरती बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के फैसले में न्यायालय ने माना कि गृहिणी का काम सीधे परिवार की आर्थिक स्थिरता में योगदान देता है। 2017 में राष्ट्रीय बीमा कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी के फैसले में मुआवजे की गणना के सिद्धांत तय किए गए थे।

इस नए 2026 के फैसले ने इन सभी पुराने फैसलों को आधार बनाते हुए एक ठोस और एकसमान मानक तय किया है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब गृहिणी की तुलना अकुशल या कुशल मजदूर से नहीं की जाएगी  उनके काम को एक स्वतंत्र और सम्मानजनक श्रेणी में रखा गया है।

यह फैसला क्यों है इतना अहम?

भारत में करोड़ों महिलाएं घर संभालती हैं और उनका कोई औपचारिक रोजगार नहीं है। कानूनी तौर पर इन्हें ‘बिना कमाई वाली’ कहा जाता था  मानो घर चलाना, बच्चों को पालना, बुजुर्गों की देखभाल करना कोई काम ही नहीं।

इस फैसले से पहले यदि किसी गृहिणी की वाहन दुर्घटना में मौत होती थी, तो परिवार को मिलने वाला मुआवजा बेहद कम होता था। अब ‘घरेलू देखभाल की क्षति’ को एक अलग और स्वतंत्र शीर्ष के रूप में मान्यता मिली है। पीठ ने यह भी कहा कि लगभग 50% वाहन दुर्घटना मामलों में सुनवाई चार वर्ष से अधिक समय तक लंबित रहती है, जो अस्वीकार्य है। इन मामलों का एक वर्ष के भीतर निपटारा होना चाहिए।

अदालत ने ‘गृहिणी’ की जगह ‘गृह-प्रबंधक’ को तरजीह दी। यह बदलाव सिर्फ नाम का नहीं है यह उनके काम की विशालता और महत्व को पहचानने का तरीका है। पीठ ने कहा कि ये महिलाएं बड़े व्यापारियों, सफल राजनेताओं, कलाकारों और वकीलों के पीछे की अदृश्य शक्ति हैं  वे नींव की ईंटें हैं जिन पर पूरा समाज खड़ा है।

आगे क्या? क्या केवल अदालत का फैसला काफी है?

यह फैसला फिलहाल वाहन दुर्घटना मुआवजा मामलों तक सीमित है। लेकिन इसके दूरगामी असर होंगे यह धारणा कि घर का काम ‘असली काम’ नहीं है, धीरे-धीरे टूटेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि अब जरूरत है कानून बनाने की ऐसे कानून जो गृहिणियों को पेंशन, सामाजिक सुरक्षा और संपत्ति में अधिकार दें।

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला एक आईना है जो हमें दिखाता है कि हम माताओं को देवी मानते हैं, लेकिन उनके काम को ‘बेकार’ समझते हैं। ₹30,000 की यह राशि उनके पूरे योगदान की कीमत नहीं है लेकिन यह एक शुरुआत जरूर है। एक ऐसी शुरुआत जो यह कहती है: घर चलाना भी एक काम है और इस काम की कीमत होती है।

Subscribe Deshwale on YouTube

Join Our Whatsapp Group

Share.
Leave A Reply

Exit mobile version