नई दिल्ली: करीब दो दशकों की लंबी बातचीत के बाद भारत और यूरोपीय संघ ने ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते पर सहमति बना ली है। इस समझौते को दोनों पक्षों के आर्थिक संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह करार वैश्विक व्यापार संतुलन को भी नई दिशा दे सकता है।
भारत-यूरोप मुक्त व्यापार समझौता दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ता है, जिनकी संयुक्त हिस्सेदारी वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के लगभग एक चौथाई के बराबर है। इस समझौते के तहत दोनों क्षेत्रों के बीच व्यापार को आसान बनाने के लिए शुल्क में कटौती और बाजार तक पहुंच को और व्यापक किया जाएगा।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस करार से भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय बाजारों में बड़ी राहत मिलेगी। कपड़ा, आभूषण, दवाइयां, आईटी सेवाएं और कृषि उत्पाद जैसे क्षेत्रों को इससे सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है। वहीं यूरोपीय कंपनियों के लिए भारतीय बाजार में औद्योगिक मशीनरी, तकनीकी उपकरण और ऑटोमोबाइल जैसे उत्पादों की बिक्री के नए अवसर खुलेंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को आर्थिक विकास का नया द्वार बताते हुए कहा कि इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और निवेश को गति मिलेगी। उनका मानना है कि यह साझेदारी भारत की वैश्विक आर्थिक भूमिका को और मजबूत करेगी।
यूरोपीय संघ के शीर्ष नेतृत्व ने भी इस समझौते को रणनीतिक दृष्टि से अहम बताया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच यह करार खुले बाजार, निष्पक्ष व्यापार और स्थिर आपूर्ति श्रृंखला के प्रति साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भू-राजनीतिक सहयोग को भी मजबूती देगा। इससे भारत और यूरोप दोनों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने और बाहरी निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।
हालांकि राजनीतिक स्तर पर सहमति बन चुकी है, लेकिन यह समझौता अभी कानूनी प्रक्रिया और संसदों की मंजूरी के चरण से गुजरेगा। इसके बाद ही इसे औपचारिक रूप से लागू किया जाएगा। इसके प्रभावी क्रियान्वयन में लगभग एक वर्ष तक का समय लग सकता है।
कुल मिलाकर, भारत-यूरोप मुक्त व्यापार समझौता दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए दीर्घकालिक विकास, रोजगार सृजन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती का मार्ग प्रशस्त करता नजर आ रहा है।
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