धारावी, एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती। मुंबई का दिल, लेकिन दशकों से उपेक्षित। अब यहां नए विकास की योजना पर काम हो रहा है। महाराष्ट्र सरकार और अडानी ग्रुप मिलकर इसे “स्मार्ट सिटी” बनाना चाहते हैं। लेकिन इस ड्रीम प्रोजेक्ट के पीछे एक नया और चौंकाने वाला अध्याय सामने आया है—धारावी के करीब 50,000 परिवारों को मुलुंड के पुराने गारबेज डंप पर बसाने की योजना पर काम हो रहा है। यह खबर सामने आते ही हड़कंप मच गया है। तो यह तो होना ही था। लेकिन सवाल उठ रहा है कि क्या मुंबई के लाखों गरीबों को पुनर्वास के नाम पर उन्हें एक जहरीले कचरे के ढेर पर धकेला जा सकता है?
कैसे सामने आया ये मामला?
दरअसल पिछले साल 7 अप्रैल 2024 को ही महाराष्ट्र के शहरी विकास विभाग ने एक अहम प्रस्ताव पास किया था। इस प्रस्ताव के तहत मुंबई सबअर्बन कलेक्टर को निर्देश दिया गया था कि मुलुंड के पुराने डंपिंग ग्राउंड को धारावी के पुनर्वास के लिए आरक्षित किया जाए। यह वही जगह है जहां 1967 से 2018 तक मुंबई का सारा ठोस कचरा फेंका जाता था। यहाँ करीब 25 लाख टन गारबेज जमा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यहां आज भी जहरीली गैसें निकल रही हैं, और यह जमीन मनुष्यों के बसने लायक नहीं है। अब सवाल उठता है कि इसमें अडानी ग्रुप का क्या रोल है? तो धारावी पुनर्विकास प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी अडानी रियल्टी को दी गई है। दिसंबर 2022 में टेंडर प्रक्रिया के बाद अडानी समूह ने इस योजना के लिए सबसे ऊंची बोली लगायी थी—करीब ₹5,069 करोड़। अब वे अगले कुछ सालों में धारावी को एक वर्ल्ड-क्लास शहर में बदलना चाहते हैं। और इस प्रोजेक्ट की लागत करीब ₹23,000 करोड़ मानी जा रही है। इस पूरी योजना से लगभग 6.5 लाख लोग सीधे प्रभावित होने वाले हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—इनमें से करीब 50,000 लोगों को गारबेज डंप पर शिफ्ट करना क्या इंसाफ है?
क्या है मुलुंड डंपिंग ग्राउंड की सच्चाई?
यह एरिया पूर्वी मुंबई में स्थित है और इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 60 हेक्टेयर है। 1967 से 2018 तक यहाँ सारे मुम्बई महानगर का ठोस कचरा डंप किया जाता रहा है। आज की तारीख में यहाँ करीब 25 लाख टन कुल कचरा डंप किया हुआ है। इसकी वर्तमान स्थिति ऐसी है कि यह डेवलपमेंट ज़ोन के बाहर है और इसे नॉन-रेसिडेंशियल क्षेत्र करार दिया गया है। 2018 में यहां कचरा फेंकना तो बंद हो गया, लेकिन यहाँ अब तक कोई रिहैबिलिटेशन या कचरे के ट्रीटमेंट का काम पूरा नहीं हुआ है। इसलिए स्थानीय लोग और विशेषज्ञ इसे एक “हेल्थ हैज़र्ड” मानते हैं।
विशेषज्ञों की राय क्या कहती है?
पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि मुलुंड डंप में रहना लोगों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। वहां जमीन के नीचे जहरीले रसायन और मिथेन गैस मौजूद हैं। मुंबई सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट विभाग के अनुसार, इस जमीन का इस्तेमाल तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि वहां का पूरा बायोरिएक्टर सिस्टम साफ न हो जाए। लेकिन सरकार की ओर से इसे लेकर अब तक कोई औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई है। हालांकि आंतरिक सूत्रों के अनुसार, यह कदम बस एक “ट्रांजिट कैंप” के रूप में प्रस्तावित है, स्थायी नहीं। लेकिन गौरतलब बात यह है कि शहरी विकास मंत्रालय के नोट में साफ लिखा हुआ है—”मुलुंड डंपिंग ग्राउंड को धारावी पुनर्वास के लिए चिह्नित किया जाए।” इससे साफ हो जाता है कि इसे एक स्थायी पुनर्वास स्थल माना जा रहा है।
लोगों की प्रतिक्रिया
ऐसी सूचना मिलने के बाद धारावी के निवासियों में घोर नाराज़गी फैली हुई है। कई सामाजिक संगठनों और एनजीओ ने इसे “मानवाधिकार का उल्लंघन” कहा है। एक स्थानीय निवासी ने कहा, “हम जहां हैं, वहां भले ही तंग हैं, लेकिन जिंदा तो हैं। हमें जहर के ढेर पर क्यों भेजा जा रहा है?” वैसे भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में “जीवन के अधिकार” की बात की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार कहा है कि स्वच्छ पर्यावरण में रहना भी इसी का हिस्सा है। ऐसे में कचरे के डंप पर लोगों को बसाना सीधे तौर पर इस अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है।
आश्चर्यजनक रूप से अभी तक इस मसले पर किसी भी बड़ी राजनीतिक पार्टी ने खुलकर बयान नहीं दिया है। महाराष्ट्र की सत्तारूढ़ सरकार भी इस फैसले पर चुप्पी साधे हुए है। और यह हैरान कर देने वाली बात है, क्योंकि धारावी मुंबई की राजनीति में अहम भूमिका निभाता है।
जमीन की राजनीति
धारावी का क्षेत्र करीब 240 हेक्टेयर में फैला हुआ है। इसलिए मुंबई के रियल एस्टेट के खिलाड़ियों की नजरें सालों से इस पर टिकी हैं। कई बार टेंडर रद्द हुए, कंपनियां बदलीं, लेकिन अब जाकर अडानी ग्रुप को यह मौका मिला है। जानकारों का कहना है कि पुनर्वास के नाम पर लोगों को शहर के बाहर भेजकर इस प्राइम लोकेशन को कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट्स के लिए तैयार किया जा रहा है।
विकल्प क्या हैं?
अगर सरकार सच में लोगों की भलाई चाहती है, तो ऐसे कई विकल्प मौजूद हैं जिन्हें अमल में लाया जा सकता है। इस हेतु धारावी के आस-पास ही कोई ट्रांजिट हाउसिंग झोन बनाया जा सकता है। या अगर गारबेज डंप के पास ही लोगों को बसाना है, तो फिर वहाँ की जमीन को पहले पूरी तरह रेमेडिएट कर लिया जाए। और इससे पहले सार्वजनिक चर्चा और स्थानीय सहमति कायम की जाए तब फैसला लिया जाए। लेकिन बड़े दुख की बात है कि वर्तमान योजना में जनता को पूरी तरह से नजरअंदाज़ किया गया है। धारावी के लोगों के लिए यह प्रोजेक्ट एक उम्मीद की किरण हो सकती थी। लेकिन गारबेज डंप पर पुनर्वास की खबर ने इस सपने को डर में बदल दिया है।
यानी कहा जा सकता है कि इस पूरे मामले में पारदर्शिता की भारी कमी है। तब सवाल तो उठने ही वाला है कि क्या सरकार और कॉर्पोरेट्स मिलकर गरीबों को “अदृश्य” करने की साजिश रच रहे हैं? विकास जरूरी है, लेकिन उसका मतलब लोगों को जहर के ढेर पर भेजना नहीं होना चाहिए। क्या धारावी के लोग इस “विकास” के हक़दार हैं भी या ये बस एक और कॉर्पोरेट डील है?

