गुजरात सरकार का नया विवाह पंजीकरण नियम एक बार फिर उस बहस को सामने ले आया है, जिसे देश की सर्वोच्च अदालत कई बार स्पष्ट कर चुकी है क्या बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से शादी करने का पूरा अधिकार है या नहीं?
राज्य सरकार ने हाल में यह प्रावधान जोड़ा है कि यदि कोई युवक या युवती विवाह पंजीकरण के लिए आवेदन करता है और वह 21 वर्ष से कम आयु का है, तो उसके माता-पिता या अभिभावकों को इसकी सूचना दी जाएगी। सरकार का कहना है कि यह कदम पारदर्शिता और सुरक्षा के लिए है, ताकि किसी प्रकार की जबरन शादी या धोखाधड़ी को रोका जा सके।
पहली नजर में यह एक प्रशासनिक प्रक्रिया लग सकती है। लेकिन जब इसे संविधान के नजरिए से देखा जाता है, तो मामला गहरा हो जाता है।
भारत में विवाह की कानूनी उम्र महिलाओं के लिए 18 वर्ष और पुरुषों के लिए 21 वर्ष है। 18 वर्ष की महिला और 21 वर्ष का पुरुष अपने फैसले खुद लेने के लिए कानूनन सक्षम माने जाते हैं। किसी भी केंद्रीय विवाह कानून में यह नहीं लिखा है कि बालिग व्यक्ति को शादी के लिए माता-पिता की अनुमति या सूचना देना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट कई बार साफ कर चुका है कि बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने का मौलिक अधिकार है। 2006 के लता सिंह मामले में अदालत ने कहा था कि बालिग होने के बाद व्यक्ति अपनी मर्जी से शादी कर सकता है। 2018 के हादिया मामले में भी अदालत ने स्पष्ट किया कि शादी का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। उसी वर्ष शांति वहिनी मामले में अदालत ने ऑनर किलिंग और पारिवारिक दखल को असंवैधानिक बताया।
सबसे अहम फैसला 2017 के पुट्टस्वामी मामले में आया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत फैसले जैसे शादी, धर्म या जीवनशैली व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता का हिस्सा हैं।
यही वह बिंदु है जहां गुजरात का नियम सवालों के घेरे में आता है। सरकार कहती है कि वह सिर्फ सूचना दे रही है, सहमति नहीं मांग रही। लेकिन भारतीय सामाजिक परिस्थितियों में यह “सूचना” कई बार दबाव, धमकी या हिंसा में बदल सकती है।
समर्थकों का तर्क है कि यह कदम सुरक्षा के लिए है। आलोचकों का कहना है कि जबरन शादी या अपराध रोकने के लिए पहले से कानून मौजूद हैं। ऐसे में हर मामले में माता-पिता को सूचना देना क्या जरूरी और संतुलित कदम है?
यदि यह नियम अदालत में चुनौती पाता है, तो न्यायालय यह देखेगा कि क्या यह प्रावधान संविधान के अनुरूप है, क्या यह आवश्यक और संतुलित है, और क्या यह वयस्कों की स्वतंत्रता पर अनावश्यक हस्तक्षेप करता है।
यह बहस सिर्फ विवाह पंजीकरण की नहीं है। यह सवाल है कि एक लोकतांत्रिक समाज में व्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा क्या है और राज्य उस सीमा का सम्मान कैसे करता है।
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