आजकल वर्टिकल शोज़ या माइक्रोड्रामाज़ ने पूरे एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में तूफ़ान मचा दिया है। तीन–चार साल पहले किसने सोचा था कि 2–2 मिनट के एपिसोड वाले, 40–50 एपिसोड की छोटी-सी सीरीज़ इतना हंगामा मचा देंगी? लेकिन आज ये हर जगह रहा है।
हर कोई या तो वर्टिकल शो बना रहा है, या लिख रहा है, या फिर उनमें एक्ट कर रहा है। मतलब काम और मौक़े तो बढ़े हैं, सही बात है। लेकिन इसी ट्रेंड ने क्रिएटिविटी को भी पहले से ज़्यादा चोट पहुंचाई है।
सब कुछ तब शुरू हुआ जब Douyin (चीन का TikTok) ने माइक्रोड्रामाज़ वाला कान्सेप्ट शुरू किया। इस ट्रेंड का असर ये हुआ की 2023–24 में चीन की माइक्रोड्रामा इंडस्ट्री ने लगभग ₹25,000 करोड़ की कमाई कर ली।
कुछ माइक्रोड्रामाज़ चीन में आज ₹1–3 करोड़ रोज़ कमा रहे हैं सब्सक्रिप्शन और एपिसोड के अंदर ब्रांड प्लेसमेंट मॉडेल से। इसलिए टिक-टोक (ग्लोबल), कोरियन प्लेटफ़ॉर्म्स, थाईलैंड और वियतनामी मीडिया कंपनियाँ, और यहां तक कि स्नैप, मेटा रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स भी शॉर्ट स्टोरीटेलिंग को जमकर पुश कर रहे हैं।
ये कई नामों से इंडस्ट्री में धूम मचा रहे हैं — शॉर्ट ड्रामा, मिनी-सीरीज़, एपिसोडिक रील्स, माइक्रो-शोज़, और शॉपेबल स्टोरीटेलिंग।
जब इंडियन मेकर्स और प्लेटफ़ॉर्म्स भी दर्शक खींचने के लिए इस रेस में कूदे, तो शुरुआत से ही ग़लती की। ये सोचने के बजाय कि इंडियन्स को क्या नया, अपना और बेहतर कंटेंट दिया जाए, उन्होंने सीधे दूसरे देशों के शो कॉपी करने शुरू कर दिए, कभी पैसे देकर, कभी बिना पूछे उधार लेकर।
आज प्लेटफ़ॉर्म क्या मांगते हैं?
‘थोड़ा देसी टच डालो, भारतीय मसाला डालो… और शो छापो।’
और सबसे बड़ा झटका?
प्रोड्यूसर्स से उम्मीद की जाती है कि 45 एपिसोड वाली पूरी वर्टिकल सीरीज़, हर एपिसोड 2 मिनट और वो भी सिर्फ़ 3 दिन में शूट हो जाए।
जी हाँ, सिर्फ़ तीन दिन!
मतलब रोज़ का 30 मिनट तैयार फाइनल आउटपुट! क्या ये नॉर्मल लगता है? यह एक पागलपन है, और सबसे यहां – पूरी तरह क्रिएटिव खुदकुशी।
आइए तुलना करते हैं:
एक बड़ी फिल्म रोज़ 4–6 मिनट होती है।
एक टीवी सीरियल रोज़ 20–22 मिनट।
और वर्टिकल शो? उनका बजट?
पूरी 45-एपिसोड की सीरीज़ वो भी सिर्फ़ ₹10–15 लाख में।
अगर प्रोड्यूसर 3 दिन में शूट खत्म कर दे, तो उसके हाथ में बचते हैं सिर्फ़ ₹1–3 लाख। और अगर नहीं कर पाया तो सीधा घाटा।
ज़्यादातर वर्टिकल शो 10, 12, यहां तक कि 16–16 घंटे की ब्रूटल शूटिंग शिफ्ट के साथ बनाए जाते हैं। न टेक्नीशियन को एक्स्ट्रा पैसा, न कलाकारों को।
और क्रू को कैसे मानाया जाता है?
“शो के लिए इतना तो करना ही पड़ेगा।”
“टीमवर्क है। डेडलाइन में खत्म करना पड़ेगा।”
हम भारतीय सच में भोले हैं, टीमवर्क के नाम पर खुद को बेच देते हैं।
भारत में ये सिस्टम शायद तब शुरू हुआ जब वर्टिकल इंडस्ट्री ने चीन से प्रेरणा ली। लेकिन हमने एक सच्चाई पूरी तरह नजरअंदाज कर दी – चीन अपनी इंटेंसिटी के लिए मेहनताना देता है, न की मुफ़्त में घिसता है।
उनका प्रोडक्शन सिस्टम:
- डिसिप्लिन में आगे,
- प्लानिंग में आगे,
- स्क्रिप्टिंग में आगे,
- मौद्रीकरण में आगे।
और हम?
हम जुगाड़ को इनोवेशन बोलकर खुश हैं।
और कंटेंट?
आज के ज़्यादातर भारतीय वर्टिकल शो, ग्लोबल कंटेंट की कॉपी हैं। आपने कुछ देखे होंगे तो समझ ही गए होंगे। इनमें भारतीय आत्मा, भारतीय कहानी कहने की मासूमियत, भारतीय टच कुछ भी नहीं है।
एक और खतरनाक चीज़ है – स्लीज़, सेक्सुअलाइज्ड कंटेंट।
क्योंकि सेक्स बिकता है, क्लिक मिलते हैं, और एल्गोरिदम शॉक वैल्यू को रिवॉर्ड देता है। इसलिए प्लेटफ़ॉर्म्स धड़ाधड़ सेक्सुअलाइज्ड कंटेंट बनवा रहे हैं।
ये भागदौड़ बिना दिशा, बिना विज़न के धीरे-धीरे इंडिया की वर्टिकल इंडस्ट्री को अंदर से खत्म कर रही है।
शुरुआत से ही हम अपनी पहचान बनाना भूल गए। हम चीन की माइक्रोड्रामा इंडस्ट्री का लो बजट डुप्लीकेट बनने में लगे हैं।
पहले दुनिया चीन की मैन्युफैक्चरिंग के सामने हार गई थी, अब वही कहानी क्रिएटिव कंटेंट में दोहराई जा रही है।
रास्ता है?
हां, लेकिन उसमें हिम्मत चाहिए।
क्योंकि आज ज़्यादातर वर्टिकल प्लेटफॉर्म और क्रिएटर्स वही पुरानी सोच में फंसे हुए हैं, बदलाव से डरते हैं और आगे बढ़ना ही नहीं चाहते। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि दर्शकों को खुश करने के नाम पर वे उसी चीज़ का दम घोंट रहे हैं जो इंडिया की अगली क्रिएटिव और इकोनॉमिक एक्सपोर्ट बन सकती है।
एक मेड इन इंडिया, मेड फॉर इंडिया वर्टिकल इकोसिस्टम, जो भारतीय भावनाओं, संस्कृति, ह्यूमर, अजीबपन, कहानी कहने की परंपरा और क्रिएटिव सोच पर आधारित हो। यह बदलाव हमें दुनिया में आगे ले जा सकता है।
वरना चीन और बाकी देश हंसते रहेंगे, और हम कॉपी-पेस्ट करते रहेंगे।
तो अब सच-सच बताइए, आप क्या सोचते हैं?
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