२८ फ़रवरी २०२६ की सुबह तेहरान के पास्तूर इलाक़े के ऊपर धुआँ उठा। सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई के दफ़्तर के पास मिसाइलें गिरीं। क़ुम, कर्मानशाह, इस्फ़हान और करज में धमाकों की ख़बरें आईं। ईरान का हवाई क्षेत्र बंद हो गया। राजधानी में मोबाइल सेवा ठप हो गई।
वॉशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक वीडियो बयान में पुष्टि की कि अमेरिकी सेना ने ईरान में “बड़े युद्ध अभियान” शुरू किए हैं। उन्होंने इसे ईरानी शासन से “तत्काल ख़तरों” को ख़त्म करने की कार्रवाई बताया। इज़राइल के रक्षामंत्री इज़राइल काट्ज़ ने भी हमलों की पुष्टि की और उन्हें इज़राइल की सुरक्षा के लिए अनिवार्य बताया। अमेरिकी अधिकारियों ने साफ़ कहा कि यह “छोटी कार्रवाई नहीं है।”
यह पल महीनों से बन रहा था। अब वह आ गया।
वार्ता की मेज़ और जंग का तक़ाज़ा
जो बात सबसे चौंकाने वाली है वह यह है कि हमले से ठीक एक दिन पहले अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्ज़रलैंड में परोक्ष परमाणु वार्ता का एक और दौर हुआ था। ईरानी राज्य मीडिया ने यह भी याद दिलाया कि यह दूसरी बार है जब बातचीत के बीच में उनके देश पर हमला हुआ। पहला मौक़ा जून २०२५ का बारह दिवसीय संघर्ष था।
ओमानी मध्यस्थ ने बताया था कि ईरान संवर्धित यूरेनियम के भंडारण पर सहमत हो गया है। पर सैन्य कार्यक्रम कहीं और और कहीं पहले तय हो चुका था। राजनीतिक संवाद और सैन्य निर्णय अलग-अलग पटरियों पर दौड़ रहे थे। यह ढाँचा पहचाना-सा लगता है। इराक़ पर हमले से पहले भी कुछ ऐसा ही हुआ था।
ट्रंप ने फ़रवरी में चेतावनी दी थी कि अगर ईरान गंभीरता से बात नहीं करता तो “बहुत बुरे नतीजे” होंगे। ईरान ने उनकी शर्तें नहीं मानीं। सैन्य विकल्प सामने आ गया। ईरान ने “कुचल देने वाले” जवाब की बात कही। इज़राइल ने राष्ट्रव्यापी आपातकाल घोषित किया, हवाई अड्डे बंद किए और अस्पतालों को भूमिगत स्थानों में स्थानांतरित किया।
आसमान की ख़ामी और दशकों की ग़लती
तो फिर एक सवाल जो बार-बार उठता है। इज़राइली और अमेरिकी विमान और मिसाइलें ईरानी हवाई क्षेत्र में इतनी आसानी से कैसे घुस गईं, और एक बार नहीं बल्कि दो बार?
जून २०२५ के संघर्ष में इज़राइली सेना ने लगभग ३०० मिसाइल लॉन्चर और कई वायु रक्षा केंद्रों पर हमले का दावा किया था। उसके बाद ईरान ने अपनी रक्षा प्रणाली फिर से खड़ी नहीं की। दिसंबर २०२५ में रूस के साथ पुनर्निर्माण की एक रिपोर्ट आई थी पर ज़रूरी प्रणालियाँ समय पर नहीं पहुँचीं। मॉस्को और तेहरान के बीच बरसों से चर्चित Su-35 लड़ाकू विमान अभी तक नहीं आए। चीन ने निगरानी में मदद की पर सीधी सुरक्षा नहीं दी।
असल बात यह है कि ईरान ने दशकों तक जानबूझकर आक्रामक क्षमता को तरजीह दी और रक्षात्मक तंत्र को नज़रअंदाज़ किया। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी ने बैलिस्टिक मिसाइलें, ड्रोन और क्षेत्रीय प्रतिनिधि नेटवर्क बनाए। लेबनान, इराक़, सीरिया और यमन में प्रभाव फैलाया। रणनीतिक सोच यह थी कि क्षेत्रीय स्तर पर तनाव बढ़ाने की क्षमता ही पर्याप्त रोकथाम होगी। पर यह सोच साल भर के भीतर दो बार परखी जा चुकी है।
प्रतिबंधों ने आधुनिकीकरण को रोका। ईरान का अधिकांश वायुसेना बेड़ा १९७० के दशक का है। शाह के दौर के F-14 विमान किसी तरह मरम्मत करके उड़ाए जा रहे हैं। पर प्रतिबंध ही सब कुछ नहीं। आईआरजीसी और नियमित सेना के बीच की आंतरिक राजनीति ने भी रक्षा सुधार को हाशिये पर रखा। मिसाइलें बनाना विचारधारात्मक प्रतिष्ठा का विषय था। वायु सुरक्षा नहीं।
ईरान ने पहुँच बनाई। छाँव नहीं बनाई।
रूस और चीन – मदद कितनी असली है
मॉस्को और बीजिंग ने तनाव कम करने की अपील की। रूस ने जनवरी २०२५ में ईरान के साथ बीस साल की रणनीतिक साझेदारी पर हस्ताक्षर किए थे। उसने कहा कि उसने वॉशिंगटन को हमले से मना करने की कोशिश की। चीन ने गहरी चिंता जताई।
पर न रूस और न चीन का ईरान के साथ कोई आपसी रक्षा संधि है। दोनों में से कोई भी खाड़ी में अमेरिकी सेना से सीधे टकराने को तैयार नहीं दिखता। रूस यूक्रेन में उलझा है। चीन ईरान की ऊर्जा ख़रीद और खाड़ी देशों के साथ अपने रिश्तों के बीच संतुलन साध रहा है। चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा ख़रीदार है। यह आर्थिक रिश्ता बना रहेगा। इससे हवाई सुरक्षा नहीं मिलती।
जून २०२५ के बाद रूस के पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने ईरान को परमाणु हथियार देने की संभावना का ज़िक्र किया था। यह औपचारिक नीति नहीं थी। पर इस तरह के बयान यह बताते हैं कि रणनीतिक हताशा में कही गई बातें भी किस तरह हिसाब-किताब बदल सकती हैं।
रज़ा पहलवी, निर्वासन और ज़मीनी सच्चाई
हमले की सुबह रज़ा पहलवी ने इस अभियान को इस्लामी गणराज्य के ख़िलाफ़ मानवीय हस्तक्षेप बताया। उन्होंने ईरानी सुरक्षाकर्मियों से अपील की कि वे शासन की रक्षा न करें।
यहाँ से ज़रा रुककर देखना ज़रूरी है।
ईरान के भीतर “महिला, जीवन, आज़ादी” आंदोलन के नेताओं ने हमलों की आलोचना की। उनका कहना था कि विदेशी बमों से देश के भीतर असली बदलाव नहीं आता। ख़ुद पूर्व इज़राइली ख़ुफ़िया प्रमुख आमोस यादलिन ने माना है कि हवाई ताक़त अकेले किसी शासन को नहीं गिराती। निर्वासन की राजनीति और देश के भीतर की वैधता हमेशा एक जगह नहीं मिलतीं।
ईरान के भीतर की दरारें
ईरान एक समरूप समाज नहीं है। फ़ारसी बोलने वाले बहुसंख्यक हैं पर अज़ेरी, कुर्द, अरब, बलोच और तुर्कमेन समुदाय बड़े क्षेत्रीय समूह हैं। इस्लामी गणराज्य ने दशकों तक इन केंद्रापसारी ताक़तों को ज़बरदस्ती, विचारधारा और सुरक्षा तंत्र से क़ाबू में रखा।
अगर केंद्र कमज़ोर पड़ता है तो ये सभी तंत्र एक साथ टूट सकते हैं। कुर्द गुटों के इराक़ी कुर्द समूहों से सीमापार संबंध हैं। तेल-समृद्ध ख़ूज़िस्तान में अरब असंतोष पुराना है। दक्षिण-पूर्व में बलोच विद्रोह लंबे समय से सुलग रहा है।
सबसे ख़तरनाक स्थिति सुव्यवस्थित सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि कई क्षेत्रों में बँटी हुई सत्ता होगी। और होरमुज़ जलडमरूमध्य के पास एक खंडित ईरान सिर्फ़ उस क्षेत्र की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की समस्या है।
सांप्रदायिक संतुलन बदलने वाला है
१९७९ से ईरान पूरे मध्य-पूर्व में शिया राजनीतिक इस्लाम का सबसे बड़ा राज्य-संरक्षक और धार्मिक आधार रहा है। एक गंभीर रूप से कमज़ोर ईरान का मतलब होगा कि हिज़्बुल्लाह अपनी रणनीतिक गहराई और अधिकांश वित्तपोषण खो देगा। हूती अपना सबसे बड़ा सैन्य आपूर्तिकर्ता खो देंगे। इराक़ में शिया मिलिशिया अपना संरक्षक खो देंगे। तेहरान से बग़दाद, दमिश्क़ और बेरूत तक फैला प्रभाव का वह चाप ईरानी एकजुटता पर ही टिका है।
खाड़ी के सुन्नी राजशाही देशों पर रणनीतिक दबाव कम होगा जो १९७९ के बाद पहली बार होगा। सऊदी अरब का विज़न २०३०, इज़राइल से उसका सामान्यीकरण और क्षेत्रीय कूटनीति इस बदले माहौल में ज़्यादा व्यावहारिक हो जाएगी। तुर्की का क्षेत्रीय प्रभाव भी बढ़ेगा।
एक बात साफ़ कहनी होगी। ईरानी प्रतिकारशक्ति के बिना मध्य-पूर्व में उन जिहादी धाराओं के लिए भी जगह बन सकती है जिन्हें आईआरजीसी ने अपने प्रभाव क्षेत्र में दबाए रखा था। एक अस्थिर करने वाली ताक़त का जाना किसी स्थिर ताक़त का आना नहीं होता।
सीमित हमला या शासन का अंत?
यह सबसे बड़ा सवाल है और अभी इसका कोई पक्का जवाब नहीं है।
ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका लंबा युद्ध नहीं चाहता। फिर भी ईरानी सैनिकों से हथियार डालने की अपीलें यह भी बताती हैं कि महत्वाकांक्षाएँ शायद उतनी सीमित नहीं हैं जितनी बताई जा रही हैं। एक नियंत्रित अभियान ईरान को कमज़ोर करेगा पर राज्य को क़ायम रखेगा। एक ध्वस्त ईरान वैसी अनिश्चितता पैदा करेगा जो इराक़ २००३ या लीबिया २०११ से कहीं ज़्यादा जटिल होगी। वहाँ के जातीय, सांप्रदायिक और क्षेत्रीय समीकरण बेहद पेचीदा हैं।
निर्णायक कार्रवाई के समर्थकों का तर्क है कि पुनर्निर्माण और नए सिरे से परमाणु कार्यक्रम को रोकना ज़रूरी है। संयम के समर्थकों का कहना है कि शासन हटाने के बाद स्थिर उत्तराधिकार की कोई गारंटी नहीं होती।
जो तय है वह यह है। तेहरान के ऊपर धुआँ है। तेल बाज़ार हिल रहे हैं। होरमुज़ जलडमरूमध्य पर पूरी दुनिया की नज़र है।
ऑपरेशन लायन्स रोर एक सीमित सुधार साबित होगा या एक बड़े बदलाव का पहला अध्याय, यह केवल दागी गई मिसाइलों पर नहीं बल्कि उनके बाद लिए जाने वाले राजनीतिक फ़ैसलों पर भी निर्भर करेगा।
“यह खबर अभी विकसित हो रही है। इस रिपोर्ट में दी गई सभी जानकारी प्रकाशन के समय (2 बजे IST, 28 फरवरी 2026) सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है। स्थिति बदलने के साथ विवरण में बदलाव हो सकता है।”
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