हाल ही में अमेरिका ने ब्रिक्स (BRICS) के सदस्य देशों, यथा ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका को चेतावनी दी है कि यदि ये देश अमेरिकी डॉलर की बजाय अपनी स्वतंत्र मुद्रा व्यवस्था विकसित करने का प्रयास करते हैं, तो उन्हें 100% टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है। इस संदर्भ में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी स्पष्ट कर दिया है कि भारत बहुध्रुवीयता (Multipolarity) के प्रति प्रतिबद्ध है और वह अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का ही पालन करेगा। वैसे भी यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भू-राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

ब्रिक्स और इसकी आर्थिक भूमिका

ब्रिक्स समूह वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख हिस्सा है। इन देशों का संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद (GDP) विश्व अर्थव्यवस्था का लगभग 30% है। यह समूह वैश्विक व्यापार और निवेश पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। ब्रिक्स का प्राथमिक उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाना और पश्चिमी देशों के वित्तीय नियंत्रण को संतुलित करना है।

ब्रिक्स की स्वतंत्र मुद्रा नीति

हाल के वर्षों में ब्रिक्स देशों ने अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के प्रयास किये हैं। यह प्रयास ब्रिक्स न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की स्थापना और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार समझौतों के माध्यम से किये गए हैं। इसका सीधा उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की भूमिका कम करना है। ब्रिक्स देश अमेरिकी डॉलर की बजाए युआन, रुपया और अन्य स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने की योजना बना रहे हैं। साथ ही रूस और चीन डिजिटल मुद्राओं पर भी कार्य कर रहे हैं, ताकि डॉलर-आधारित वैश्विक वित्तीय प्रणाली की निर्भरता को समाप्त किया जा सके। इस हेतु ब्रिक्स रिजर्व करेंसी यानी एक संयुक्त आरक्षित मुद्रा पर भी चर्चा की जा रही है, जो भविष्य में अमेरिकी डॉलर की जगह ले सकती है।

लेकिन अमेरिका की ओर से  विशेष रूप से पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यह चेतावनी बार-बार दी जा रही है। उन्होंने कहा है कि यदि ब्रिक्स देश डॉलर से अलग होते हैं, तो अमेरिका इन देशों से आयात पर 100% तक आयात शुल्क (Tariff) लागू कर सकता है।इस संबंध में अमेरिका कई तर्क दे रहा है। वास्तव में अमेरिका चाहता है कि उसकी मुद्रा वैश्विक लेन-देन में प्रमुख बनी रहे, जिससे उसका वित्तीय नियंत्रण बना रहे। साथ ही वह वैश्विक व्यापार को अपने हिसाब से संतुलित करना चाहता है। लेकिन यदि ब्रिक्स देश अमेरिकी डॉलर का उपयोग बंद कर देते हैं, तो यह अमेरिका के व्यापार संतुलन को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावे अमेरिका ब्रिक्स देशों को आर्थिक दबाव में लाकर अपने भू-राजनीतिक हितों को भी सुरक्षित रखना चाहता है।

गौरतलब है कि भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि भारत बहुध्रुवीयता (Multipolarity) को बढ़ावा देने के पक्ष में है और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता रहेगा। इसका अर्थ यह है कि भारत कभी किसी एक देश या एक मुद्रा पर निर्भर नहीं रहेगा। इसकी बजाय भारत कई वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलन बनाये रखेगा। भारत पहले से ही रूस और खाड़ी देशों के साथ रुपये में व्यापार को प्रोत्साहित कर रहा है। साथ ही भारत ब्रिक्स के भीतर नवाचार और निवेश को बढ़ावा देने पर भी जोर दे रहा है। अतः भारत अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ की आशंका को ध्यान में रखते हुए संतुलित विदेश नीति अपनाने का ही प्रयास करेगा।

अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों की धमकी का वैश्विक प्रभाव और भविष्य की संभावनाएं

यदि अमेरिका उच्च टैरिफ लागू करता है, तो यह ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। और जैसा कि अमेरिका को डर है, यदि डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती दी जाती है, तो उससे वैश्विक वित्तीय बाजार में अस्थिरता आ सकती है।
हालांकि ब्रिक्स देशों को इतना डरने की भी जरूरत नहीं है क्योंकि इससे उनकी आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ने की भी संभावना है। इससे विकसित देशों के प्रभाव से मुक्त होकर विकासशील देशों को अधिक अवसर मिलेंगे। साथ ही डिजिटल और क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से नई वित्तीय प्रणाली भी विकसित हो सकती है।
वैसे ब्रिक्स और अमेरिका के बीच का यह टकराव भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित कर सकता है। ऐसे में भारत को अपने हितों की रक्षा करते हुए बहुपक्षीय कूटनीति (Multilateral Diplomacy) अपनानी होगी ताकि न केवल अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव से बचा जा सके, बल्कि ब्रिक्स के साथ भी अपने संबंध मजबूत बनाये रखा जा सके।

दरअसल यह संपूर्ण घटनाक्रम वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव का संकेत दे रहा है, जहां विकासशील देश अपनी आर्थिक स्वतंत्रता के लिए अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। और आगे के नीति-निर्माण में भारत की रणनीति निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

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