रियाद के किसी घर में सुबह नल खोलिए, तो ठंडा, साफ़ पानी आता है। इसमें अजीब कुछ नहीं लगता, जब तक आप नक्शा न खोलें। रियाद समुद्र से सैकड़ों किलोमीटर अंदर, रेत और पथरीले पठार के बीच बसा है। जिस देश की यह राजधानी है, वहाँ एक भी स्थायी नदी नहीं है और एक भी स्थायी झील नहीं। फिर भी 3.2 करोड़ से ज़्यादा लोग वहाँ रहते हैं। उनका गिलास कौन भरता है?
पहला जवाब आसमान से नहीं मिलता। देश के ज़्यादातर हिस्सों में साल भर में 100 मिलीमीटर या उससे भी कम बारिश होती है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के हिसाब से पूरे देश का औसत करीब 59 मिलीमीटर है। जो थोड़ी अच्छी बारिश होती है, वह पश्चिम और दक्षिण के पहाड़ों पर गिरती है। नदियों की जगह यहाँ ‘वादी’ हैं, यानी सूखे नाले, जो बारिश के बाद कुछ देर के लिए जी उठते हैं और फिर रेत में खो जाते हैं।
असली जवाब समुद्र में है। सऊदी सांख्यिकी प्राधिकरण (GASTAT) के 2023 के आँकड़े, जो उसका सबसे ताज़ा प्रकाशित जल-लेखा है, बताते हैं कि देश की वितरित पानी आपूर्ति का करीब आधा हिस्सा खारे समुद्री पानी को मीठा करके आता है। 2022 में यह 44 प्रतिशत था। एक साल में ऐसे पानी का उत्पादन 31 प्रतिशत बढ़ गया।
इस मशीनरी का सबसे बड़ा चेहरा खाड़ी तट पर रास अल-ख़ैर है। अप्रैल 2014 में इसका पहला चरण चालू हुआ। तब पूरी परियोजना की लागत करीब 7.2 अरब डॉलर बताई गई थी। आज इसे रोज़ लगभग 30 लाख घन मीटर पानी देने वाला दुनिया का सबसे बड़ा प्लांट कहा जाता है। यहाँ से निकला पानी पाइपलाइनों के सहारे रेगिस्तान पार करके रियाद तक पहुँचता है।
पानी को सैकड़ों किलोमीटर और पहाड़ों की ऊँचाई तक धकेलना भी कम बड़ा काम नहीं है। गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने 2023 में सऊदी की जल ट्रांसमिशन पाइपलाइनों को दुनिया का सबसे बड़ा पाइपलाइन नेटवर्क माना, जो 14,217 किलोमीटर लंबा है। सऊदी वॉटर अथॉरिटी के प्रमुख इन्हें ‘नदियाँ’ कहते हैं, ऐसी नदियाँ जो समुद्र से पहाड़ की ओर बहती हैं, 2,800 मीटर से भी ऊपर तक। यह दावा अथॉरिटी के सहयोग से बने एक पेज पर आया है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि मुझे नहीं मिली। स्वतंत्र स्रोतों के मुताबिक शुक़ैक की एक पाइपलाइन 2,000 मीटर से ज़्यादा की चढ़ाई पार करती है, और यह भी कोई मामूली बात नहीं।
लेकिन समुद्र पूरी कहानी नहीं है। सऊदी अरब के नीचे हज़ारों साल पुराना पानी जमा है, जिसे ‘जीवाश्म जल’ कहते हैं। यह कभी बरसी बारिश का वह पानी है जो गहरे जलभृतों में क़ैद हो गया, और जिसे आज की बारिश लगभग नहीं भर पाती। FAO की एक पुरानी केस स्टडी के मुताबिक ऐसे जलभृतों से पानी निकालना असल में पानी की खुदाई करना है।
इसी खज़ाने पर देश का बड़ा बोझ टिका है। 2023 में प्राकृतिक स्रोतों से मिले पानी का 62 प्रतिशत गैर-नवीकरणीय भूजल था। राहत की बात यह है कि 2022 में यह 68 प्रतिशत था।
और यह पानी जाता कहाँ है? ज़्यादातर खेतों में। 2023 में खेती ने करीब 12.3 अरब घन मीटर पानी पिया, जबकि पानी पर होने वाले कुल ख़र्च में उसका हिस्सा सिर्फ़ 0.5 प्रतिशत था। उद्योगों की प्यास भी बढ़ रही है। वितरित पानी में उनका हिस्सा 22 से बढ़कर 30 प्रतिशत हो गया।
अगर समुद्र इतना बड़ा स्रोत है, तो अल जज़ीरा के विश्लेषण में यह क्यों लिखा है कि कुल उपयोग में मीठे किए पानी का हिस्सा करीब 18 प्रतिशत है और 79 प्रतिशत ज़रूरत भूजल से पूरी होती है? GASTAT की गिनती में यही हिस्सा 22 प्रतिशत है। ये तीनों आँकड़े अलग-अलग पैमानों से नापे गए हैं, इसलिए आपस में नहीं मिलते। इतना तय है कि खाड़ी में सबसे ज़्यादा समुद्री पानी मीठा करने वाला सऊदी अरब अपनी कुल ज़रूरत के लिए सबसे कम समुद्र पर टिका है। पड़ोसी क़तर में पीने के पानी का 99 प्रतिशत से ज़्यादा समुद्र से आता है।
इसकी क़ीमत भी है। समुद्र का पानी मीठा करने में भारी ऊर्जा लगती है, इसलिए जल क्षेत्र भाप पर चलने वाली थर्मल तकनीक छोड़कर रिवर्स ऑस्मोसिस की ओर बढ़ रहा है। शुऐबा-3 प्लांट को इसी तरह बदला जा रहा है, और उसके डेवलपर ACWA Power का दावा है कि इससे बिजली की ज़रूरत करीब 70 प्रतिशत घटेगी।
तो रियाद के नल का पानी न किसी नदी का है, न किसी झील का। वह आधा समुद्र से आया है और आधा हज़ारों साल पुरानी बारिश से, जिसे ज़मीन से खींचा जा रहा है। नदियाँ न होने की कमी देश ने पाइपों से पूरी की है। पर असली सवाल अब भी सामने है कि जब ज़मीन के भंडार ख़त्म होने लगेंगे, तब यह देश पूरी तरह समुद्र के भरोसे कैसे जिएगा?
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