२५ जून १९७५। आज से ठीक ५१ साल पहले की वह रात, जब पूरा हिंदुस्तान चैन की नींद सो रहा था लेकिन सुबह उठने पर देश का चेहरा बदल चुका था। यह वह रात थी जब भारत में पहली बार शांतिकाल में आपातकाल लगाया गया। आधी रात से कुछ मिनट पहले, राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद ३५२ के तहत देश में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर दी। कारण बताया गया ‘आंतरिक अशांति’, यानी देश के अंदर की बेचैन हालत। उस रात दिल्ली के तमाम अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई ताकि कोई खबर बाहर न जा सके। देश को अगली सुबह आकाशवाणी के जरिए इस बड़े फैसले की खबर मिली। वे २१ महीने जो आए, उन्होंने देश को एक ऐसा सबक दिया जो आज भी याद रखने लायक है।
आपातकाल के पीछे की कहानी थोड़ी पहले से शुरू होती है। १९७० के दशक की शुरुआत में देश की आर्थिक हालत काफी कठिन थी। बेरोजगारी बढ़ रही थी, महंगाई सिर उठाने लगी थी। बिहार और गुजरात में बड़े जन आंदोलन हो रहे थे, जिन्हें जयप्रकाश नारायण जिन्हें लोग प्यार से ‘जेपी’ कहते थे की अगुवाई मिल रही थी। १२ जून १९७५ को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक बड़ा फैसला सुनाया। न्यायालय ने १९७१ के लोकसभा चुनाव में सरकारी मशीनरी के गलत इस्तेमाल के कारण उस समय की प्रधानमंत्री का चुनाव रद्द कर दिया और ६ साल के लिए चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी। इस फैसले के बाद देश में उनके इस्तीफे की मांग तेजी से उठने लगी। अगला दिन २५ जून १९७५ एक बड़ी रैली के साथ शुरू हुआ और रात होते-होते देश के नागरिक अधिकार का हक ही बदल गया।
जब हक छीन लिए गए
आपातकाल लगते ही नागरिकों के मौलिक अधिकार यानी बुनियादी हक एक झटके में रोक दिए गए। अनुच्छेद ३५८ और ३५९ लागू किए गए, जिससे बोलने की आजादी, इकट्ठा होने का हक और अदालत का दरवाजा खटखटाने का हक सब कुछ बंद हो गया। शाह आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग १ लाख ११ हजार लोगों को बिना किसी मुकदमे के जेल में बंद कर दिया गया। इनमें नेता, पत्रकार, लेखक, छात्र सब शामिल थे। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी कई बड़े नेता मीसा (आंतरिक सुरक्षा अधिनियम) के तहत उठाए गए। अखबारों पर कड़ी सेंसरशिप लगा दी गई कोई भी खबर छपने से पहले सरकारी सेंसर से इजाजत लेना जरूरी था। लेकिन कुछ अखबारों ने इस सेंसरशिप का विरोध अनोखे ढंग से किया। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लोकतंत्र की ‘शोक सूचना’ छापी। इंडियन एक्सप्रेस ने अपना संपादकीय बिल्कुल खाली छोड़ दिया। फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने रवींद्रनाथ टैगोर की कविता ‘जहाँ मन निडर हो’ छापी खामोशी में भी एक बड़ी बात कह दी।
आपातकाल के दौरान कुछ आंकड़े आज भी अंदर तक हिला देते हैं। शाह आयोग जो आपातकाल खत्म होने के बाद न्यायमूर्ति जे.सी. शाह की अध्यक्षता में बनी थी ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया कि इस दौर में देश में १ करोड़ ७ लाख नसबंदी ऑपरेशन हुए। अकेले १९७६-७७ में ८१ लाख से ज्यादा ऑपरेशन किए गए। इन ऑपरेशनों में १,७७४ मौतें रिपोर्ट की गईं। कई राज्यों में लोग नसबंदी से मना करते थे तो उन्हें राशन, घर, नौकरी और बैंक लोन से वंचित कर दिया जाता था। दिल्ली के कई गरीब इलाकों में झुग्गी-झोपड़ियां भी तोड़ दी गईं। सरकारी मुलाजिमों में से २५,९६२ लोगों को आपातकाल के दौरान जबरदस्ती सेवा से मुक्त किया गया। कलात्मक दुनिया भी इस असर से नहीं बची गुलजार की फिल्म ‘आंधी’ पर प्रतिबंध लगाया गया और ‘किस्सा कुर्सी का’ की सभी प्रतियां नष्ट कर दी गईं।
जनता ने दिया अपना जवाब
जनवरी १९७७ में, आपातकाल के दौरान ही, नए चुनावों का ऐलान हुआ। १६ से २० मार्च १९७७ के बीच देश ने मतदान किया और जनता ने अपना फैसला सुना दिया। कांग्रेस पार्टी को भारी हार का सामना करना पड़ा। जनता पार्टी की सरकार बनी और मोरारजी देसाई जो खुद आपातकाल में जेल गए थे देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। आपातकाल २१ मार्च १९७७ को सरकारी तौर पर खत्म हुआ। बाद में ४४वें संविधान संशोधन (१९७८) के जरिए संविधान में बदलाव किए गए ताकि ऐसा दोबारा न हो सके। ‘आंतरिक अशांति’ की जगह ‘सशस्त्र विद्रोह’ शब्द रखा गया, जिससे आगे आपातकाल की घोषणा के लिए बहुत कड़ी शर्त जरूरी हो गई।
आज, ५१ साल बाद, यह दौर भारत के इतिहास का एक अहम हिस्सा बन चुका है। यह हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र सिर्फ चुनावों से नहीं चलता इसका असली आधार है आजाद प्रेस, स्वतंत्र न्यायपालिका और नागरिकों के मौलिक अधिकार। जब भी इन तीनों में से कोई कमजोर पड़ता है, लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। आवाज को दबाया जा सकता है, लेकिन खत्म नहीं किया जा सकता यह १९७७ की जनता ने साबित कर दिया था। आज का दिन सिर्फ एक तारीख नहीं है यह एक जरूरी याद है। एक याद कि हम कहाँ से आए हैं, और क्यों अपने अधिकारों की हिफाजत करना हमेशा जरूरी रहता है।
Subscribe Deshwale on YouTube


