कोक स्टूडियो भारत सीज़न 4 अपने नए गीत ‘हूर’ के साथ इस बार श्रोताओं को कश्मीर की समृद्ध लोक संस्कृति और संगीत परंपरा से रूबरू करा रहा है। यह गीत केवल एक संगीत प्रस्तुति नहीं, बल्कि कश्मीर की सदियों पुरानी कहानी सुनाने की परंपरा को आधुनिक संगीत के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास है। लोककथाओं, सूफियाना एहसास और समकालीन संगीत का यह अनूठा संगम श्रोताओं को एक अलग ही संगीत यात्रा पर ले जाता है।
‘हूर’ कश्मीरी लोककथाओं और ‘अफ़साना गोरी’ की रूहानी भावना से प्रेरित है। इसकी कहानी दो किरदारों, ‘शेख’ और ‘हूर’, के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों के बीच संवाद, संगीत और भावनाओं के माध्यम से प्रेम, विरह, समर्पण और आध्यात्मिक जुड़ाव की कहानी सामने आती है। यह प्रस्तुति कश्मीर की उन महफिलों की याद दिलाती है, जहाँ कलाकार संगीत के जरिए राजाओं, प्रेमियों, यात्रियों और रहस्यमयी पात्रों की कहानियाँ सुनाया करते थे।
इस गीत को अपनी आवाज़ और संगीत से जीवंत बनाने का काम फहीम अब्दुल्ला, अर्सलान निजामी और उस्ताद कैसर निजामी ने किया है। तीनों कलाकारों ने पारंपरिक कश्मीरी संगीत को आधुनिक रॉक और समकालीन धुनों के साथ इस तरह जोड़ा है कि गीत अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखते हुए आज के श्रोताओं को भी आकर्षित करता है।
गीत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रस्तुति शैली है। कहीं यह संवाद जैसा महसूस होता है तो कहीं संगीत कहानी को आगे बढ़ाता है। इसे सुनते हुए ऐसा लगता है जैसे किसी पारंपरिक कश्मीरी महफिल में बैठकर एक लोककथा का जीवंत अनुभव किया जा रहा हो। गीत के अंतिम हिस्से में कश्मीरी भाषा की पंक्तियाँ इसकी सांस्कृतिक गहराई को और मजबूत बनाती हैं।
कोक स्टूडियो भारत का उद्देश्य हमेशा से भारत की विविध लोक और क्षेत्रीय संगीत परंपराओं को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच तक पहुँचाना रहा है। हर सीज़न में अलग-अलग राज्यों की सांस्कृतिक धरोहर को आधुनिक संगीत के साथ प्रस्तुत किया जाता है, ताकि युवा पीढ़ी भी इन परंपराओं से जुड़ सके। ‘हूर’ इसी प्रयास की नई कड़ी है, जो कश्मीर की लोक विरासत को नए अंदाज़ में सामने लाती है।
कोका-कोला इंडिया और साउथवेस्ट एशिया के आईएमएक्स लीड शांतनु गांगने ने कहा कि भारत की सबसे प्रभावशाली कहानियाँ उसकी क्षेत्रीय संस्कृतियों से निकलती हैं। उनके अनुसार, कश्मीर की कहानी कहने की परंपरा भावनात्मक और शायराना विरासत से भरपूर है। ‘हूर’ के माध्यम से इसी विरासत को आधुनिक संगीत के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है, ताकि इसकी आत्मा बरकरार रहे और यह दुनिया भर के श्रोताओं तक पहुँच सके।
गीत से जुड़े कलाकारों ने भी इसे अपने लिए खास अनुभव बताया। फहीम अब्दुल्ला ने कहा कि ‘हूर’ ने उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दोबारा जोड़ने का अवसर दिया। वहीं अर्सलान निजामी के अनुसार कश्मीरी लोक संगीत की संवाद शैली इसे अनोखा बनाती है। उस्ताद कैसर निजामी ने कहा कि इस गीत में पारंपरिक महफिलों का आत्मीय माहौल आज भी महसूस किया जा सकता है।
‘ऐ अजनबी’, ‘बुल्लेया वे’ और ‘कचौड़ी गली’ के बाद ‘हूर’ कोक स्टूडियो भारत सीज़न 4 के संगीत संग्रह में एक और खास प्रस्तुति बनकर उभरा है। यह गीत न केवल कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि लोक संगीत समय के साथ बदलते हुए भी अपनी आत्मा को जीवित रख सकता है।
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