दो दिन में किडनी भारत पहुंचाने का वादा। दिल्ली में मिनटों के अंदर मैचिंग डोनर। मुंबई में डॉक्टर और अस्पताल की व्यवस्था।
यह सब सिर्फ दो हज़ार डॉलर के बिटकॉइन जमा के बदले।
एक हालिया जांच में कम से कम तीन ऐसी डार्क वेब वेबसाइटें सामने आई हैं, जो खुलेआम इंसानी अंग बेचने का दावा करती हैं। किडनी, दिल, फेफड़े और लीवर सब कुछ ऑनलाइन शॉपिंग की तरह लिस्ट किए गए हैं, कीमत टैग और शॉपिंग कार्ट के साथ।
पहली नज़र में यह खबर डरावनी लगती है।
पर असली सवाल यह नहीं कि डार्क वेब पर क्या लिखा है। असली सवाल यह है कि भारत में अंगों की असली तस्करी कहां होती है। और जवाब चौंकाने वाला है वह डार्क वेब पर नहीं, बल्कि उन्हीं अस्पतालों में होती है जिन्हें हम भरोसेमंद मानते हैं।
डार्क वेब की दुकान
डार्क वेब ऐसी वेबसाइटों को कहा जाता है जो सामान्य ब्राउज़र जैसे क्रोम या सफारी से नहीं खुलतीं। इन्हें देखने के लिए टोर जैसे खास सॉफ्टवेयर की ज़रूरत पड़ती है। यह वेबसाइट चलाने वालों और इस्तेमाल करने वालों दोनों की पहचान छुपा लेता है।
जांच में सामने आई इन साइटों पर उपयोगकर्ताओं को आगे की बातचीत के लिए टेलीग्राम पर भेजा जाता है।
भारत में अंग प्रत्यारोपण को लेकर सख्त कानून हैं। वैध तरीके से अंग पाने में महीनों का इंतज़ार करना पड़ता है। ऐसे में दो दिन में किडनी मिलने का दावा असंभव जैसा लगता है।
यही वजह है कि जांचकर्ता इन साइटों को ज़्यादातर धोखाधड़ी मानते हैं जो निराश और बेसहारा मरीज़ों की मजबूरी का फायदा उठाकर पैसा ऐंठने का काम करती हैं।
असली खतरा कहीं और छुपा है
अब बात करते हैं उस कहानी की, जो कम सुर्खियां बटोरती है, पर कहीं ज़्यादा असली है।
2008 में गुड़गांव में एक बड़ा किडनी रैकेट पकड़ा गया था। इसे अमित कुमार नाम का एक फर्जी डॉक्टर चला रहा था। जांच में पता चला कि यह गिरोह पिछले छह-सात सालों से सक्रिय था, और पिछले एक दशक में छह सौ से ज़्यादा किडनी प्रत्यारोपण कर चुका था।
गरीब मज़दूरों को नौकरी के बहाने बुलाया जाता। फिर उन्हें किडनी बेचने के लिए मनाया जाता। जो मना करते, उन्हें नशीला पदार्थ देकर जबरन ऑपरेशन कर दिया जाता। इस रैकेट से जुड़े डॉक्टरों को बाद में अदालत ने कई साल की सज़ा सुनाई।
यह कोई पुरानी बात नहीं है।
हाल ही में महाराष्ट्र के चंद्रपुर से शुरू हुई एक जांच ने भारत और कंबोडिया के बीच चल रहे एक और किडनी तस्करी रैकेट का पर्दाफाश किया। कर्ज़ में डूबे एक किसान का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उसने बताया कि उसने कर्ज़ चुकाने के लिए कंबोडिया जाकर अपनी किडनी बेच दी थी।
जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि मरीज़ों से एक किडनी के लिए पचास से अस्सी लाख रुपये तक वसूले जा रहे थे। जबकि गरीब डोनर को सिर्फ पांच से आठ लाख रुपये ही मिलते थे। इस मामले में तमिलनाडु के एक निजी अस्पताल से जुड़े डॉक्टर सहित कई लोग गिरफ्तार किए गए।
यानी असली रैकेट किसी अनजान वेबसाइट पर नहीं, बल्कि नामी अस्पतालों की चारदीवारी के भीतर, असली डॉक्टरों की मौजूदगी में चलता है।
यहां कोई बिटकॉइन नहीं मांगा जाता। यहां सीधे नकद लेन-देन होता है, फर्जी कागज़ात बनाए जाते हैं, और गरीब लोगों को उनकी मजबूरी का हवाला देकर राज़ी किया जाता है।
डर किस चीज़ का होना चाहिए
डार्क वेब की यह कहानी टेक्नोलॉजी को खलनायक बनाकर पेश करना आसान बना देती है मानो असली खतरा किसी गुमनाम वेबसाइट में छुपा हो।
पर सच यह है कि टेक्नोलॉजी यहां सिर्फ एक नया औज़ार है, जिसका इस्तेमाल पुराने ज़माने के ठगों ने नए तरीके से किया है। बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी का सबसे बड़ा फायदा ठगों को यही मिलता है कि पैसे का लेन-देन ट्रेस करना मुश्किल हो जाता है। इसीलिए यह ठगी डार्क वेब पर सबसे आसानी से पनपती है।
लेकिन जो लोग वाकई अपने किसी अपने की जान बचाने के लिए अंग की तलाश में हैं, उनके लिए असली सबक यह है जो खतरा सुर्खियां बनता है, ज़रूरी नहीं वही सबसे बड़ा हो।
भारत में अंगों की गैरकानूनी खरीद-फरोख्त का असली नेटवर्क अब भी उन्हीं जगहों पर पनपता है, जहां हम भरोसा करना सीखे हैं अस्पतालों में, डॉक्टरों की सफेद कोट के पीछे, और उन दलालों के ज़रिए जो गरीबी और बेबसी का फायदा उठाना जानते हैं।
डार्क वेब पर बिकते “किडनी” और “दिल” शायद सिर्फ एक डिजिटल जाल हों। पर असली सौदा, असली दर्द और असली शोषण, उससे कहीं ज़्यादा करीब मौजूद है।
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