By: Ragini Chaubey
लखनऊ की पुरानी गलियों में जब आप घूमते हैं, तो शायद आपको अंदाज़ा भी न हो कि किसी छोटे से वर्कशॉप में बैठा कारीगर जानवर की हड्डी को नफीस गहनों और शोपीस में बदल रहा है। यह कला बोन कार्विंग कहलाती है, और माना जाता है कि इसकी जड़ें मुगल काल तक जाती हैं, जब हाथी दांत यानी आइवरी पर नक्काशी एक शाही शौक हुआ करता था। बाद में नवाबों के दौर में इस हुनर को संरक्षण मिला, और धीरे-धीरे यह लखनऊ की पहचान बन गई। सदियां बीत गईं, राजशाही खत्म हो गई, लेकिन यह कला आज भी ज़िंदा है, बस इसका मंच बदल गया है दरबार की जगह अब बाज़ार ने ले ली है।
सबसे पहली बात जो इस शिल्प को खास बनाती है, वो है इसका कच्चा माल। जिस हड्डी को आम तौर पर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, वही यहां कलाकृति का आधार बनती है। बाज़ार से लाई गई हड्डी को सबसे पहले छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। ऊपरी परत को खुरच कर हटाया जाता है, और फिर एक पारंपरिक औज़ार, जिसे बासुली कहा जाता है, उससे काटने का काम शुरू होता है। टुकड़ों को बाद में एक कटिंग मशीन से सही आकार दिया जाता है। यह वो चरण है जब हड्डी से एक तेज़ गंध आती है, लेकिन कारीगर बताते हैं कि एक बार यह प्रक्रिया खत्म हो जाए, तो फिर वह बदबू नहीं रहती।
कटाई के बाद बारी आती है सफाई की। हड्डी को सोडे के साथ गर्म पानी में करीब तीन से चार घंटे तक उबाला जाता है। यह प्रक्रिया हड्डी की सतह पर मौजूद चर्बी और चिकनाई को निकालने में मदद करती है, साथ ही बदबू को भी काफी हद तक कम कर देती है। इसके बाद हड्डी को हाइड्रोजन पेरोक्साइड के घोल में डुबोया जाता है और छह से सात घंटे तक धूप में रखा जाता है। यह ब्लीचिंग प्रक्रिया हड्डी को साफ सफेद रंग देती है, जो आगे की नक्काशी के लिए ज़रूरी आधार तैयार करती है।
असली कलाकारी शुरू होती है इसके बाद। हड्डी के टुकड़ों को मनचाहे आकार में काटकर फेविकॉल जैसे चिपकाने वाले पदार्थ से आपस में जोड़ा जाता है। सूखने के बाद कंपास की मदद से डिज़ाइन को सतह पर चिन्हित किया जाता है। फिर ड्रिलिंग मशीन से छेद बनाए जाते हैं, और उसके बाद कारीगर अपने हाथों और अलग-अलग औज़ारों से बारीक नक्काशी का काम शुरू करता है। जाली जैसे महीन डिज़ाइन बनाने के लिए तेकोरा नाम का एक खास औज़ार इस्तेमाल होता है, जिससे बेहद नाज़ुक और जटिल पैटर्न उभर कर सामने आते हैं।
आखिरी चरण है फिनिशिंग का, जहां तैयार उत्पाद को अलग-अलग ग्रेड के बफ से चमकाया जाता है। कई बार इन नाजुक टुकड़ों को ज़रूरत के हिसाब से रंगा भी जाता है, ताकि उनकी खूबसूरती और निखर सके। पूरी प्रक्रिया, हड्डी की सफाई से लेकर नक्काशी और फिनिशिंग तक, कम से कम चार से पांच दिन का समय लेती है। यह काम सिर्फ पुरुष कारीगर ही करते हैं, और दिलचस्प बात यह है कि इसका सीधा रिश्ता मौसम से भी जुड़ा है। बारिश और सर्दी का मौसम इस काम के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है, जबकि गर्मियों में तेज़ धूप और गर्मी की वजह से हड्डी में दरार पड़ने का खतरा रहता है। यही वजह है कि कारीगर गर्मी के मौसम में हमेशा छांव में बैठकर काम करते हैं, ताकि उनकी मेहनत बेकार न जाए।
इस शिल्प की एक और खूबी यह है कि इसमें कुछ भी बर्बाद नहीं होता। नक्काशी के दौरान जो हिस्से खराब हो जाते हैं या टूट जाते हैं, उन्हें फेंका नहीं जाता, बल्कि रीसायकल करके खाद बनाई जाती है, जो खेतों में काम आती है। यानी यह कला सिर्फ खूबसूरती की मिसाल नहीं, बल्कि टिकाऊपन की भी एक बेहतरीन मिसाल है।
लखनऊ की सांस्कृतिक पहचान आमतौर पर चिकनकारी, इत्र और वहां की तहज़ीब से जोड़कर देखी जाती है, लेकिन इन्हीं के साथ-साथ बोन कार्विंग जैसी कलाएं भी अक्सर परदे के पीछे रह जाती हैं। यह वही शिल्प है जो कभी नवाबों के दरबार की शान हुआ करता था, और जिसे आज भी कुछ गिने-चुने कारीगर अपने हाथों की मेहनत से ज़िंदा रखे हुए हैं। हर तराशा हुआ टुकड़ा, हर महीन जाली, असल में सदियों पुरानी एक विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश है। यह कला बताती है कि हुनर और धैर्य से किसी भी चीज़, चाहे वो बेकार समझी जाने वाली हड्डी ही क्यों न हो, उसे भी अनमोल बनाया जा सकता है। और शायद यही वजह है कि बदलते वक्त, बदलते बाज़ार और बदलती पीढ़ियों के बावजूद, लखनऊ की बोन कार्विंग ने आज भी अपनी पहचान को बचाए रखा है।
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