By: Ragini Chaubey
ट्रेन की पटरियों से गुज़रते हुए शायद आपने झुग्गियों की वह कतार देखी होगी, जो पटरियों से बस कुछ कदम की दूरी पर खड़ी रहती है कपड़े सूखते, बच्चे खेलते, और ठीक बगल से गुज़रती ट्रेनें। लेकिन क्या कभी सोचा है कि उन घरों के भीतर ज़िंदगी कैसे चलती है?
दिल्ली के पश्चिमी हिस्से में एक जगह है, मायापुरी एशिया का सबसे बड़ा स्क्रैप बाज़ार, जहां पुरानी गाड़ियों के पुर्ज़े बिकते हैं और सालाना कारोबार हज़ारों करोड़ रुपये का है। कुछ लोग इसे एक और वजह से याद करते हैं। साल 2010 में स्क्रैप में बिकी एक पुरानी रेडिएशन मशीन से रेडियोएक्टिव कोबाल्ट-60 के टुकड़े निकले थे, आठ लोग एम्स में भर्ती हुए और एक मज़दूर की इलाज के दौरान मौत हो गई। हैरानी की बात इतने साल बाद भी यहां रेडिएशन डिटेक्टर जैसी जांच व्यवस्था नहीं है, जबकि कई देशों के स्क्रैप यार्ड में यह आम बात है।
लेकिन जो लोग यहां बरसों से रह रहे हैं, उनके लिए रोज़ का सबसे बड़ा खतरा रेडिएशन नहीं है। उनकी ज़िंदगी हर दिन दो जोखिमों के बीच गुज़रती है एक तरफ़ तेज़ रफ़्तार ट्रेनें, दूसरी तरफ़ स्क्रैप के ढेर, जहां तेल, एसिड और धातु की धूल हवा में घुली रहती है। एक सेवा संगठन के अनुसार यहां करीब पांच हज़ार लोग इन्हीं दो सीमाओं के बीच रहते हैं, कई घर इतने पास कि दीवार और पटरी के बीच मुश्किल से एक कदम की जगह बचती है।
यह दूरी कभी-कभी जान भी ले लेती है। एक पुरानी रिपोर्ट के मुताबिक, यहां की एक महिला ने आठ साल की उम्र में ट्रेन की चपेट में आकर अपने दोनों पैर गंवा दिए थे। आज वह व्हीलचेयर पर चलती हैं और पकौड़ों का स्टॉल लगाकर अपने परिवार का गुज़ारा करती हैं।
शुरुआत में यहां बसने वाले ज़्यादातर लोग देश के अलग-अलग हिस्सों से आए मज़दूर थे, जो स्क्रैप बाज़ार में काम की तलाश में आए और फिर यहीं बस गए। काम पास था, किराया नहीं देना पड़ता था और यही वजह आज भी लोगों को यहां बांधे हुए है। दूसरी जगह जाना काम छूटने जैसा है। ट्रेन का शोर, जो शुरुआत में डराता था, अब रोज़मर्रा की आवाज़ बन चुका है डर पीछे छूट गया है, बस आदत बची है।
रहने की हालत भी आसान नहीं है। गलियां इतनी संकरी हैं कि एक साथ दो लोगों का गुज़रना मुश्किल हो जाता है। पानी की भारी किल्लत है एक नल पर बारह से पंद्रह घरों की निर्भरता है, और यह पानी अक्सर आसपास की फैक्ट्रियों के रसायनों से प्रभावित रहता है। अधिकांश घरों में शौचालय नहीं हैं, इसलिए लोगों को बाहर जाना पड़ता है।
यही वजह है कि यहां के कई परिवारों में मलेरिया, डेंगू या चिकनगुनिया जैसा बुखार आम बात है। काम के दौरान सुरक्षा के इंतज़ाम भी न के बराबर हैं स्क्रैप से निकलने वाला तेल, धूल और रसायन सीधे सांसों और त्वचा तक पहुंचते हैं।यह पढ़कर असहजता हो सकती है, लेकिन यहां के लोगों की जिंदगी इसी हकीकत के बीच गुजरती है।
फिर भी, इस तंगहाली के बीच एक जज़्बा बाकी है। यहां के बच्चे पटरियों किनारे खाली ज़मीन पर क्रिकेट खेलते दिखाई देते हैं, आंखों में बड़ा क्रिकेटर बनने का सपना लिए स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सपना इलाके में आम है। महिलाएं सिलाई जैसे हुनर सीखकर परिवार की आय बढ़ाने में मदद करती हैं, और कुछ महिला समूहों ने इलाके में चल रही अवैध शराब की दुकानों के खिलाफ़ आवाज़ भी उठाई है।
अगर इन्हीं हालात में रहकर लोगों के भीतर इतनी हिम्मत बाकी है, तो सोचिए कि सही मौका और सहारा मिलने पर वे कितनी दूर तक जा सकते हैं।
लेकिन इस उम्मीद के साथ एक कड़वी सच्चाई भी जुड़ी हुई है। पीने का साफ़ पानी मिलना यहां तय नहीं है, मगर स्थानीय लोगों के मुताबिक नशे की चीज़ें गांजा, चरस, शराब आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं, जिनकी तरफ़ युवा भी खिंच जाते हैं। यह बस्ती जिस उपेक्षा के साथ बड़ी हुई है, उसका सबसे ज़्यादा असर महिलाओं और बच्चों पर दिखता है, जिनकी सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं खासकर तंग गलियों और अंधेरे कोनों में।
मायापुरी अकेली ऐसी जगह नहीं है। दिल्ली में करीब 750 बड़ी-छोटी बस्तियां हैं, जिनमें लगभग 20 लाख लोग रहते हैं, और देश के हर बड़े शहर में रेलवे पटरियों किनारे ऐसी बस्तियां मौजूद हैं, जहां हालात शायद इससे भी बदतर हैं। साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की पटरियों किनारे बनी करीब 48 हज़ार झुग्गियां हटाने का आदेश दिया था, लेकिन बदलाव की रफ़्तार अब भी धीमी है।
सरकार के लिए यह ज़मीन अवैध कब्ज़ा हो सकती है, लेकिन यहां रहने वालों के लिए यह चार दशकों की मेहनत से बना घर है। यही सबसे बड़ा टकराव है।
मायापुरी की इस बस्ती में लोग ट्रेन की आवाज़ से डरना छोड़ चुके हैं, लेकिन किसी समाज के लिए यह सामान्य नहीं होना चाहिए कि उसके नागरिक रोज़ खतरे के बीच जीने की आदत डाल लें। चालीस साल बाद भी न पानी की किल्लत गई, न स्क्रैप बाज़ार में एक रेडिएशन डिटेक्टर लगा। सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि ये लोग यहां क्यों रहते हैं। सवाल यह है कि इतने वर्षों बाद भी इनके लिए सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन अब तक एक सपना क्यों बना हुआ है।
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