क्या मुंबई भी दिल्ली जैसी प्रदूषण की स्थिति की ओर बढ़ रहा है? महाराष्ट्र की राजधानी में तेजी से गिरती एयर क्वालिटी ने इस चिंता को जन्म दिया है। इस सप्ताह शहर का औसत AQI लगभग 270 रिकॉर्ड किया गया है, जो ‘खराब’ श्रेणी में आता है। मुंबई की बढ़ती प्रदूषण समस्या पर दायर पिटिशनों की सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट ने BMC और MPCB की कड़ी निंदा की।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल निर्माण स्थलों पर पॉल्यूशन मॉनिटरिंग सिस्टम और लंबी स्क्रीन लगाने का आदेश देना पर्याप्त नहीं है। असली बात यह है कि ये नियम धरातल पर प्रभावी रूप से लागू हो रहे हैं या नहीं। मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखते हुए, हाईकोर्ट ने शहर के AQI स्तर की निगरानी के लिए एक विशेष कमेटी का गठन किया है।
कई इलाकों में सुबह से रात तक धुंध, स्मॉग और कम विज़िबिलिटी ने लोगों की रोजमर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित किया है। तटीय शहर होने के बावजूद मुंबई अब दिल्ली जैसी गंभीर प्रदूषण समस्या की पकड़ में आ चुका है। इसके पीछे लगातार जमा होती धूल, ट्रैफिक, मौसम और शहरी निर्माण की एक पूरी चेन जिम्मेदार है।
मुंबई में पिछले कुछ सालों से बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य लगातार चल रहा है। मेट्रो, फ्लाईओवर, तटीय परियोजनाएँ, सड़कें, रिहायशी टावर्स। इन प्रोजेक्ट्स से निकलने वाली धूल PM2.5 और PM10 को तीव्र गति से बढ़ाती है, और जब समुद्री हवा कमजोर पड़ती है तो ये प्रदूषक उठकर बिखरने की बजाय निचले स्तर पर ही स्थिर रहते हैं। शहर में ट्रैफिक एक अलग समस्या है। पेट्रोल-डीज़ल वाहनों का उत्सर्जन हर दिन हवा में छोटे कणों की मात्रा को बढ़ाता है। ठंड में हवा के ठहराव ने प्रदूषण को और जमाकर रख दिया, जिससे मुंबई कई क्षेत्रों में मोटी स्मॉग की परत में ढकी दिखी।
यह भी असली समस्या है कि शहर पर जनसंख्या, ट्रैफिक और इन्फ्रास्ट्रक्चर का दबाव इतना बढ़ चुका है कि समुद्री हवा अब हवा की सफाई का प्राकृतिक काम पहले जैसा नहीं कर पा रही। इसमें डीजल जनरेटर, औद्योगिक धुआँ और सड़कों-कचरे की अनियंत्रित जलन और जोड़ दो, तो नतीजा वही बनता है-“बहुत खराब” हवा।
दिल्ली की हवा लंबे समय से “बहुत खराब” से “गंभीर” श्रेणी में दर्ज होती है, लेकिन अब दिल्ली अकेला नहीं है। कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, बेंगलुरु, पुणे—ये सभी शहर धीरे-धीरे उसी चक्र में फँस चुके हैं। पिछले 10 वर्षों के पैटर्न बताते हैं कि किसी भी प्रमुख महानगर ने साल भर में हवा की सुरक्षित श्रेणी को लगातार हासिल नहीं किया। कहीं लगातार निर्माण तो कहीं भारी ट्रैफिक, कहीं पावर प्लांट्स का उत्सर्जन और कहीं भौगोलिक स्थितियाँ—मगर परिणाम एक: हवा उतनी साफ़ कभी रहती ही नहीं जितनी एक स्वस्थ आबादी के लिए जरूरी है।
निर्माण की तेज रफ्तार, वाहनों की अधिकता, सर्दी में कम होती हवाएं और बढ़ती नमी ने प्रदूषण को शहर पर चिपकाकर रख दिया है। इसका प्रत्यक्ष असर बच्चों, बुज़ुर्गों और सांस के रोगियों पर साफ दिखता है। खांसी, गले में जकड़न, आँखों में जलन, एलर्जी, दम फूलना ये शिकायतें अब मौसम का हिस्सा बन चुकी हैं। डॉक्टर साफ कह रहे हैं कि ये सिर्फ अस्थाई असुविधा नहीं, लंबे समय में फेफड़ों और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ता है। WHO के अनुसार खराब हवा हर साल लाखों लोगों की अकाल मृत्यु का कारण बनती है—और भारत सबसे अधिक जोखिम वाले देशों की सूची में शीर्ष पर है।
विकास, जनसंख्या और प्रदूषण अब एक-दूसरे को आगे धकेलते हुए एक स्थायी शहरी-स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुके हैं। अगर आने वाले वर्षों में साफ हवा को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो ये समस्या मौसमी नहीं रहेगी—यह धीरे-धीरे भारत के बड़े शहरों की स्थायी पहचान बन जाएगी।
कहां कितनी जहरीली हुई हवा?
मुंबई की एयर क्वालिटी तेजी से खराब हुई है:-
- मुंबई का औसत AQI: 267 (अनहेल्दी)
- मझगांव: 305
- चकाला-अंधेरी ईस्ट: 263
- नेवी नगर-कोलाबा: 271
- मालाड: 223
मुंबई के आसपास भी स्थिति चिंताजनक है:-
- ठाणे: 188
- नवी मुंबई: 186
- मीरा-भायंदर: 192
- पूरे महाराष्ट्र में वायु गुणवत्ता गिर रही है, वहीं नागपुर में AQI 200 के आसपास पहुंच गया है, जो ‘अनहेल्दी’ श्रेणी में आता है.
भारत के प्रमुख शहरों की हालिया वायु गुणवत्ता (AQI) — टेबल
| शहर | हालिया AQI | श्रेणी |
|---|---|---|
| मुंबई | ~190–270 | Unhealthy / Very Poor |
| दिल्ली / NCR | 350+ | Very Poor / Severe |
| कोलकाता | ~198 | Poor |
| चेन्नई | ~156 | Moderate / Poor |
| हैदराबाद | ~178 | Poor |
| बेंगलुरु | ~143 | Moderate |
| पुणे | ~167 | Poor |
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