भारत में करॉजन (जंग) के कारण हर वर्ष होने वाले लगभग ₹12 लाख करोड़ के आर्थिक नुकसान को कम करने के लिए स्टेनलेस स्टील उद्योग ने केंद्र सरकार से राष्ट्रीय स्टेनलेस स्टील नीति और राष्ट्रीय एंटी-करॉजन मिशन लागू करने की मांग की है। उद्योग का कहना है कि यदि इस दिशा में समय रहते ठोस कदम उठाए जाएं तो देश न केवल आर्थिक नुकसान को कम कर सकता है, बल्कि वैश्विक स्टेनलेस स्टील उत्पादन का प्रमुख केंद्र भी बन सकता है।
यह मांग इंडियन स्टेनलेस स्टील डेवलपमेंट एसोसिएशन (ISSDA) और ग्लोबल स्टेनलेस स्टील एक्सपो (GSSE) के बीच हुई रणनीतिक साझेदारी के दौरान प्रमुखता से सामने आई। इस अवसर पर उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने सरकार से स्टेनलेस स्टील क्षेत्र के लिए अलग और व्यापक नीति बनाने की अपील की।
आईएसएसडीए के अध्यक्ष राजामणि कृष्णमूर्ति ने कहा कि भारत के पास वैश्विक स्टेनलेस स्टील हब बनने की पूरी क्षमता है, लेकिन इसके लिए स्पष्ट नीति और दीर्घकालिक सरकारी समर्थन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि देश में स्टेनलेस स्टील की प्रति व्यक्ति खपत अभी केवल 3.5 किलोग्राम है, जबकि वैश्विक औसत 6 से 7 किलोग्राम के बीच है। यह अंतर बताता है कि भारत में इस क्षेत्र में विकास की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि करॉजन के कारण देश की अर्थव्यवस्था को हर साल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 4 प्रतिशत नुकसान उठाना पड़ता है। यदि बुनियादी ढांचे, निर्माण, परिवहन, जल प्रबंधन और औद्योगिक परियोजनाओं में जंग-रोधी स्टेनलेस स्टील का अधिक उपयोग किया जाए, तो इस नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इससे रखरखाव की लागत घटेगी और सार्वजनिक परिसंपत्तियों की आयु भी बढ़ेगी।
इस अवसर पर जिंदल स्टेनलेस लिमिटेड के ग्रुप हेड राजीव गर्ग ने भी उद्योग की चुनौतियों और संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बढ़ते आयात और कच्चे माल की उपलब्धता जैसी चुनौतियों के बीच उद्योग को एक मजबूत और एकजुट आवाज की जरूरत है। उनके अनुसार, स्टेनलेस स्टील केवल एक औद्योगिक उत्पाद नहीं, बल्कि टिकाऊ, पर्यावरण के अनुकूल और लंबे समय तक लागत बचाने वाला समाधान है। इसलिए इसे अलग नीतिगत पहचान और प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
उद्योग का मानना है कि यदि राष्ट्रीय स्टेनलेस स्टील नीति लागू होती है और एंटी-करॉजन मिशन शुरू किया जाता है, तो इससे घरेलू विनिर्माण को नई गति मिलेगी। साथ ही आयात पर निर्भरता कम होगी, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में देश में बुनियादी ढांचे के विस्तार, स्मार्ट सिटी परियोजनाओं, रेलवे, मेट्रो, जल आपूर्ति और ऊर्जा क्षेत्र में बड़े निवेश की संभावना है। ऐसे में स्टेनलेस स्टील की मांग भी तेजी से बढ़ सकती है। यदि सरकार समय पर उचित नीति बनाती है, तो भारत न केवल अपनी घरेलू जरूरतों को बेहतर ढंग से पूरा कर सकेगा, बल्कि वैश्विक बाजार में भी मजबूत प्रतिस्पर्धी बनकर उभर सकता है।
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